
सुमिता गुप्ता सखी, मुंबई
नारी थी कभी वो सरिता,
जिससे जीवन सिंचित होता था,
उसके चरणों के स्पर्श मात्र से
हर आँगन पावन होता था।
आज वही क्यों भटक रही है
मृगमरीचिका के मेले में,
अपनी अस्मिता भूल बैठी
क्षणिक चमक के झमेले में।
जिसकी आँखों में करुणा थी,
वाणी में मधुरिम तान थी,
आज वही क्यों कठोर हुई,
क्यों खो बैठी अपनी पहचान थी।
लज्जा जिसका भूषण थी,
संस्कारों की जो मूरत थी,
क्यों पश्चिमी अंधी दौड़ में
अपनी जड़ों से दूर हुई।
अपना तन ही नहीं, मन भी
अब सौदों में बिक जाता है,
जब स्वार्थों की अग्नि बढ़े,
हर रिश्ता राख हो जाता है।
पर फिर भी आशा जीवित है,
नारी का अस्तित्व अमर है,
उसके भीतर माँ दुर्गा का
आज भी दिव्य समंदर है।
यदि वो चाहे तो फिर से
घर-घर दीप जला सकती है,
अपने तप, त्याग और ममता से
धरती स्वर्ग बना सकती है।
उठे पुनः सखी चेतना लेकर,
अपने गौरव की पहचान बने,
सखी, नारी केवल देह नहीं,
वो संस्कृति की मुस्कान बने।
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