
डॉ. अनामिका दुबे निधि, मुंबई
यूँ तो एक अरसे से हमने आईना नहीं देखा,
तुम लौट आने का वादा करो, हम संवर लेंगे।
यूँ तो मेरे चेहरे की रंगत खो-सी गई है मानो,
तुम्हारा दीदार तो हो, हम निखर लेंगे।
तेरे बिना ये शामें भी वीरान-सी लगती हैं,
तू साथ बैठ जाए तो मौसम बदल लेंगे।
कितने ही दर्द चुपके से दिल में उतर आए,
तेरे एक लफ़्ज़ पर मगर सब भूल चलेंगे।
अब तक जो अधूरी-सी पड़ी है मेरी दुनिया,
तुम हाथ थाम लो तो हम मुकम्मल हो लेंगे।
सूखी हुई आँखों में फिर ख़्वाब उतर आएँगे,
तुम लौट कर आओ तो हम फिर से हँस लेंगे।
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तुम लौट आओ कविता
बहुत ही सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति
बहुत सुन्दर सृजन