एक मध्यमवर्गीय की दास्तान

महंगाई और आर्थिक संघर्ष से जूझते भारतीय मध्यमवर्ग को दर्शाती व्यंग्य कविता की यथार्थवादी छवि।

कमल रांका, प्रसिद्ध हास्य कवि, पुणे

भारतीय संस्कृति और सोने का अटूट रिश्ता है,
जिसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ मध्यमवर्गीय ही पिसता है।
घर की गाड़ी चलती है, तेल जलता है,
और बेचारा टायर घिसता है।

सोना कोई खरीदे तो बेच दूँ,
इतना-सा बोला,
तो खरीदने को सैकड़ों ने मुँह खोला।

मेरी सोने की चिड़िया,
तू भी तो मेरी दुर्दशा पर कुछ तो बोल।

अब आगे से मैं तेल लेने नहीं जाऊँगा,
इतना-सा बोला,
तो ऑनलाइन वालों ने अपना मुँह खोला-
“हम मुफ़्त में घर दे जाएँगे,
और आप बिना सर्विस चार्ज दिए पाएँगे।”

मेरी सोने की चिड़िया,
तू भी तो मेरी दुर्दशा पर कुछ बोल।

रही बात विदेश जाने की,
तो मैंने कहा
देशहित में जाना पड़ा,
तो मैं क्या, आप भी जाओगे?
और झालमुड़ी खाने
अपने देश वापस आओगे?

मेरी सोने की चिड़िया,
तू भी तो मेरी दुर्दशा पर कुछ तो बोल,
या फिर
दस रुपये की झालमुड़ी को
एक सौ रुपये में तोल।

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