Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

रुह का रिश्ता

प्रेम, स्वतंत्रता और अधूरे रिश्तों की एक गहरी कहानी

सुरेश परिहार, पुणे

राघव हमेशा से प्रेम को लेकर बहुत गंभीर रहा था। कॉलेज के दिनों में उसके दोस्तों की तरह उसके कई रिश्ते नहीं बने। वह प्रेम को केवल आकर्षण नहीं मानता था। उसके भीतर एक स्त्री की ऐसी छवि थी, जो उसकी सबसे अच्छी दोस्त हो, जिसके सामने वह अपने मन की हर परत खोल सके, जो उसकी थकान समझे, उसकी चुप्पियों को पढ़ सके और बिना कहे उसके सिर पर हाथ फेर दे। लेकिन जीवन कहानियों की तरह नहीं चलता। घरवालों की पसंद से उसकी शादी हो गई। पत्नी बुरी नहीं थी, मगर दोनों के बीच वह आत्मीयता कभी नहीं बन पाई, जिसकी तलाश राघव को थी। जिम्मेदारियाँ थीं, बच्चे थे, दिनचर्या थी, पर कहीं भीतर एक खाली कमरा हमेशा बंद पड़ा रहा। समय बीतता गया।

एक दिन दफ्तर में नई परियोजना के सिलसिले में उसकी मुलाकात रिद्धिमा से हुई। खूबसूरत चेहरे वाली, शांत स्वभाव की, कम बोलने वाली स्त्री। पहली नजर में ही राघव को रिद्धिमा भा गई। पहली बातचीत के बाद राघव को अजीब-सी अनुभूति हुई, जैसे वह उसे बहुत पहले से जानता हो।

रिद्धिमा भी विवाहित थी। उसका पति अच्छा कमाता था, घर की सारी जरूरतें पूरी करता था, लेकिन उसके जीवन में संवाद नहीं था। वर्षों से वह केवल पत्नी, बहू और माँ की भूमिकाएँ निभा रही थी। उसके भीतर जो स्त्री कभी कविताएँ लिखती थी, रंगों से बातें करती थी, सॉफ्ट टॉय बनाती थी, वह धीरे-धीरे कहीं खो गई थी।

राघव ने पहली बार उसके हाथों से बनाया हुआ सॉफ्ट टॉय देखा। उसने सचमुच रुककर उसे देखा था।

“ये तुमने बनाया है?”

“हाँ… बस ऐसे ही।”

“ऐसे ही नहीं। इसमें बहुत दर्द है… और उम्मीद भी।”

रिद्धिमा चुप रह गई। शायद वर्षों बाद किसी ने उसकी बनाई चीज़ को इतने ध्यान से देखा था।

धीरे-धीरे बातें बढ़ने लगीं। सुबह की “गुड मॉर्निंग” से लेकर रात के “खाना खा लिया?” तक। राघव उसकी छोटी-छोटी बातों में रुचि लेने लगा। “आज तुम थकी हुई लग रही हो।” “तुम्हारी आवाज उदास है।”

“नई कविता लिखी क्या?”

रिद्धिमा हर बार हँसकर बात टाल देती, लेकिन भीतर कहीं उसे अच्छा लगता। बहुत अच्छा। उसे महसूस होने लगा कि कोई है, जो उसे सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक इंसान की तरह देखता है।

एक रात तेज बारिश हो रही थी। बच्चों और पति के सो जाने के बाद रिद्धिमा ने फोन उठाया और मैसेज किया-“सोए नहीं?” उसने पूछा।

“नींद नहीं आ रही,” राघव बोला।

“क्यों?”

“क्योंकि कुछ रिश्ते नींद से ज्यादा जरूरी लगने लगते हैं।”

फोन के उस पार लंबी चुप्पी छा गई। रिद्धिमा चाहती तो उस बातचीत को वहीं खत्म कर सकती थी, मगर उसने नहीं किया। क्योंकि सच यह था कि वह भी उस आवाज़ की आदी हो चुकी थी।

धीरे-धीरे दोनों समझने लगे कि यह केवल दोस्ती नहीं रही। लेकिन प्रेम जितना सुंदर होता है, उतना ही कठिन भी।

एक दिन रिद्धिमा ने कहा, “हमें शायद दूरी बना लेनी चाहिए।”

राघव ने पूछा, “क्यों?”

“क्योंकि हम गलत दिशा में जा रहे हैं।”

“क्या किसी को समझना गलत है?”

रिद्धिमा बोली, “नहीं… लेकिन किसी और का हो जाने के बाद किसी तीसरे के लिए धड़कना आसान भी नहीं।”

राघव पहली बार टूट गया। उसे लगा जैसे वर्षों बाद मिला उसका अधूरा सपना फिर उससे दूर जा रहा है। बहुत देर तक दोनों तरफ सन्नाटा रहा। फिर रिद्धिमा का मैसेज आया—

“आज मेरी नई कविता पूरी हुई… और पता है, उसमें रंग वापस आ गए हैं।”

राघव मुस्कुराया। उसे समझ आ गया कि प्रेम हमेशा पाने का नाम नहीं होता। कभी-कभी प्रेम किसी के भीतर मरे हुए हिस्से को फिर से जिंदा कर देने का नाम भी होता है।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

एक दिन राघव ने रिद्धिमा से मिलने को कहा। कैफे के कोने में बैठे राघव ने उसे देखा तो सिर्फ इतना कहा-“कैसी हो?”

रिद्धिमा की आँखें भर आईं।

“तुमने मुझे फिर से जीना सिखा दिया।”

“और तुमने मुझे यह समझाया कि सच्चा प्रेम हमेशा किसी को हासिल करना नहीं होता।”

राघव ने धीमे से उसका हाथ पकड़ा।

“अगर दो लोग एक-दूसरे के बिना अधूरे महसूस करें तो… क्या करना चाहिए?”

राघव ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा।

“तो फिर उन्हें समाज से नहीं, खुद से सच बोलना चाहिए…”

रिद्धिमा कुछ देर तक चुप रही। कैफे की खिड़की पर गिरती बारिश की बूंदें जैसे उसके भीतर चल रहे संघर्ष को आवाज़ दे रही थीं। उसने धीरे से अपना हाथ राघव की पकड़ से अलग किया और हल्की मुस्कान के साथ बोली- “राघव… प्रेम बहुत सुंदर होता है। शायद दुनिया की सबसे खूबसूरत अनुभूति। लेकिन प्रेम सिर्फ किसी को पा लेने का नाम नहीं होता।”

राघव उसकी आँखों में देखता रहा। रिद्धिमा की आवाज़ में शिकायत नहीं थी, केवल गहराई थी।

“तुमने मुझे समझा… मेरे भीतर की उस स्त्री को देखा, जो सालों से कहीं खो गई थी। इसके लिए मैं हमेशा तुम्हारी आभारी रहूँगी। लेकिन एक बात शायद तुम्हें समझनी होगी…”

“क्या?” राघव ने धीमे से पूछा।

“कि प्रेम का मतलब अधिकार नहीं होता।”

राघव चुप रहा। रिद्धिमा आगे बोली-“किसी को प्यार करना और किसी की पूरी दुनिया बन जाना… दोनों अलग बातें हैं। प्रेम में समर्पण होता है, लेकिन समर्पण कभी सौदे की तरह नहीं होता कि मैंने तुम्हें इतना दिया, अब तुम भी उतना ही लौटाओ।”

उसकी आँखें अब स्थिर थीं।

“तुम कहते हो कि हम एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। लेकिन सच्चा प्रेम किसी को अधूरा नहीं बनाता, राघव… वह इंसान को भीतर से और पूरा करता है।”

राघव ने महसूस किया कि आज रिद्धिमा सिर्फ उससे बात नहीं कर रही थी, बल्कि उसे कुछ समझाने की कोशिश कर रही थी।

“मैं तुमसे जुड़ी हूँ… यह सच है,” रिद्धिमा ने स्वीकार किया, “लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मैं अपने जीवन के बाकी रिश्तों को झुठला दूँ। मेरे अपने निर्णय हैं, अपनी सीमाएँ हैं, अपने दायित्व हैं। मैं किसे अपने जीवन में कितनी जगह दूँ, क्या साझा करूँ, क्या अपने भीतर रखूँ… यह तय करने का अधिकार सिर्फ मेरा है।”

राघव बस उसकी ओर देखता रहा।

“और सुनो…” रिद्धिमा हल्का-सा मुस्कुराई, “जो प्रेम सच में प्रेम होता है, वह किसी को बाँधता नहीं। वह डराता नहीं कि ‘अगर तुम मेरे नहीं हुए तो मैं टूट जाऊँगी।’ वह सामने वाले को उसकी पूरी स्वतंत्रता के साथ स्वीकार करता है।”

कुछ पल दोनों खामोश रहे। फिर रिद्धिमा ने बहुत धीरे से कहा- “तुमने मुझे फिर से लिखना सिखाया। फिर से मुस्कुराना सिखाया। लेकिन अगर इस रिश्ते में कभी ऐसा पल आए, जहाँ मुझे लगे कि मेरी साँसों पर भी किसी और का हक बनने लगा है… तो वह प्रेम नहीं रहेगा, बोझ बन जाएगा।”

राघव की आँखों में नमी उतर आई थी।

“तो क्या तुम्हें मुझसे प्रेम नहीं है?” उसने टूटती आवाज़ में पूछा।

रिद्धिमा मुस्कुराई। इस बार उसकी मुस्कान में अपनापन था, लेकिन साथ ही एक परिपक्व दूरी भी।

“है… शायद बहुत है। लेकिन मेरा प्रेम तुम्हें पाने की ज़िद नहीं करता। वह तुम्हारे जीवन को तोड़कर अपना घर नहीं बनाना चाहता।”

राघव ने महसूस किया कि प्रेम सिर्फ भावनाओं की तीव्रता नहीं, बल्कि दूसरे के अस्तित्व का सम्मान भी होता है।

रिद्धिमा उठने लगी। फिर एक पल के लिए रुकी और बोली-“हम अक्सर सोचते हैं कि प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण साथ रहना है। लेकिन कभी-कभी सबसे सच्चा प्रेम वही होता है, जहाँ दो लोग एक-दूसरे को बदलने की कोशिश नहीं करते… सिर्फ बेहतर इंसान बना देते हैं।”वह चली गई। राघव बहुत देर तक वहीं बैठा रहा। लेकिन इस बार उसके भीतर खालीपन नहीं था। दर्द था, मगर उस दर्द में एक अजीब-सी शांति भी थी। क्योंकि आज उसने समझा था. प्रेम किसी पर अधिकार जमाना नहीं, किसी को खो देने के डर में बाँध लेना नहीं, बल्कि उसके मन, उसकी स्वतंत्रता और उसके अस्तित्व को उसी रूप में स्वीकार करना है।

और शायद इसी स्वीकार में प्रेम अपनी सबसे सच्ची और सबसे कठिन परीक्षा पास करता है।

इन रचनाओं को भी पढ़ें और अपनी राय अवश्य व्यक्त करें


किताब दिल में, लैपटॉप हाथ में
“नारी केवल देह नहीं”
एक मध्यमवर्गीय की दास्तान
तुम लौट आओ…
तेरे खत
मन की आवाज़
रुह का रिश्ता

4 thoughts on “रुह का रिश्ता

  1. बहुत सुंदर यथार्थवादी रचना की प्रेम पाना नहीं उसे समझना उसे प्रोत्साहित कर मन: स्थति को दृढ़ करवाना होता है । एक दुसरे के अंदर दबी भावनाओं को बाहर निकालना उनका सम्मान करना होता है ❤️

  2. प्रेम के अलग आयाम स्थापित करती सुंदर कहानी👌

  3. अगर प्रेम में पाने की जिद्द हो तो वो प्रेम नहीं सच तो ये है कि प्रेम को समझना और महसूस कर उसे स्वतंत्र रहने देना और प्रेम में सामने वाले की भावनाओं का सम्मान ही सच्चा प्रेम है।
    बहुत सुंदर लिखा 👌

  4. एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करती हुई… मर्यादित प्रेम की हृदय स्पर्शी रचना.. बहुत ही बढ़िया लिखा है आपने 👌

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *