मन के भाव..

न के भीतर जन्म लेने वाले भाव ही रचना का आधार बनते हैं। रचनाकार हो, कलाकार हो या चित्रकार—हर सृजन उसी सूक्ष्म अनुभूति से आकार पाता है, जो मन में आहिस्ता से जन्म लेती है।
प्रकृति और परमात्मा ने इस सृष्टि में संतुलन रचा, पर जब मनुष्य अपने ही खुमार और कामना में डूब जाता है, तो यही संतुलन टूटने लगता है। जल, वायु और धरती का दूषित होना किसी बाहरी शत्रु की नहीं, बल्कि मानव की अपनी भूल की कहानी है।

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फूलों की गुफ़्तगू…

फूलों की महक में जैसे कोई नर्म-सा सवाल छुपा था। हम रुके तो उन्होंने आहिस्ता से गुफ़्तगू शुरू कर दी। हमने भी दिल का हाल कह दिया. वो बातें, जो बरसों से किसी को न बताई थीं। अजीब ये हुआ कि हमारी हर बात पर फूल और भी महकने लगे, मानो मोहब्बत ने उन्हें भी अपनी गिरफ़्त में ले लिया हो। अब बाग़ की हर कली यूँ मुस्कुराती है, जैसे हमारी रूह से उनका कोई पुराना नाता हो।

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किसी की आहट… कोई तो है

रात की नीरवता में मन बार-बार किसी अज्ञात उपस्थिति को महसूस करता है. जैसे कोई अदृश्य कदमों से मन के आँगन तक आ पहुँचा हो। पहचान स्पष्ट नहीं, पर एहसास गहरा है। कोई है… जिसकी आहट, जिसकी परछाईं, जिसकी अनकही मौजूदगी दिल को बेचैन भी करती है और आकर्षित भी। मन बार-बार उसी ओर खिंचता है.

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आत्मसंतुष्टि

बरसों बाद जब रेणू ने कलम उठाई, उसके दिल और दिमाग में अजीब सी मस्ती फैल गई। शब्दों का सागर उसके भीतर गोते लगा रहा था, और दिमाग उस सागर से मोती चुनकर उन्हें पंक्तियों में सजाने में व्यस्त था। भावनाओं की लहरें उठ रही थीं, और उसकी नाव—जो कविता का रूप धारण कर चुकी थी—उन लहरों को पार कर रही थी। हर शब्द, हर भाव उसे आत्मसंतुष्टि के द्वार तक ले गया। रेणू ने महसूस किया कि लिखना केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि आत्मा की शांति का साधन भी है। उसकी नाविक बनकर, वह अपनी रचनात्मकता की शक्ति को महसूस करते हुए आत्मसंतुष्टि के द्वार पर पहुँच गई।

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हमको सूरज है बनना

“हमको सूरज है बनना—चाहे जलना पड़े। अंधकार दूर भगाना, पाप मिटाना और जीवन में प्रकाश फैलाना ही हमारा प्रण है। यह कविता साहस, एकता और सेवा की प्रेरणा देती है।”

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ज़िंदगी गुनगुनाने लगी

अब ज़िंदगी मानो गुनगुनाने लगी है। हवा की धीमी-धीमी बयार की तरह इसमें मिठास घुलने लगी है। मीठे सपनों की छाँव में रात भी अलसाई-सी करवट लेती है। मन अजीबोगरीब खयाल बुनता रहता है और उजली चांदनी-सी उम्मीद सँजोए रहता है।

बातों और मुलाक़ातों का सिलसिला लगातार चलता है, फिर भी दिल के भीतर कहीं एक हल्की-सी खलिश बनी रहती है। बीते दिनों में चारों ओर दावानल था, घाव भी हरे-भरे थे। ऐसे कठिन समय में उसकी बातें मोगरे की महक जैसी सुकून देती थीं।

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चाय की ख़ुशबू और यादों की परतें

चाय की ख़ुशबू संग जब यादों की परतें खुलती हैं,
तो ज़िंदगी में खोया-पाया सब सामने आ खड़ा होता है।दिल अक्सर सोचता है — काश! जो चाहा था, वही मिल जाता… या ज़िंदगी एक और मौका देती।”

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ग़ज़ल

दिल-ए-नादाँ को रुसवा क्यों करें हम,ज़माने से यूँ शिकवा क्यों करें हम। हमारे दर्द को समझे नहीं वो,तो अपने मन को मैला क्यों करें हम। उन्हें बेपर्दगी का पास है जब,भला फिर उनसे पर्दा क्यों करें हम। जिसे परवाह उलफ़त की नहीं अब,उसी पर वक़्त ज़ाया क्यों करें हम। मुहब्बत कर ली क्या, आफ़त बुला…

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रात, कर न कुछ बात

रात… आज कुछ बात कर। ऐसी बात, जो पुराने सारे ग़म मिटा दे। एक बार मेरी सुन — तू हमेशा अंधेरे में क्यों रहती है? क्या तुझे भी कोई दर्द सताता है?
आ, अपनी कहानी मुझे सुना। चल, मुझसे दोस्ती कर ले। मैं तुझे उजाले से मिलवाऊँगी। तेरे जीवन में खुशियाँ भर दूँगी। ऐसा उजाला लाऊँगी कि तेरे भीतर का अंधकार हमेशा के लिए मिट जाएगा।
मैं अपनी कलम से तेरे जीवन की हर उदासी मिटा दूँगी। वहाँ सिर्फ उजाला होगा, मुस्कानें होंगी — हर कोना रोशन होगा।तो आ, रात… बस एक बार कुछ बात कर। मुझसे बात कर।

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