आत्मसंतुष्टि

रेणु परसरामपुरिया, मुंबई

आज बरसों बाद
मैंने कलम उठाई है,
दिल और दिमाग में
मस्ती सी छाई है।

दिल शब्दों के सागर में
गोते खा रहा है,
दिमाग सागर से शब्दों के
मोती चुन रहा है।

भावनाओं का उद्वेग
लहरों का निर्माण कर रहा है,
और मेरी नाव रूपी कविता को
पार लगा रहा है।

अपनी इस नाव की नाविक बनकर,
रेणू पहुंची आत्मसंतुष्टि के द्वार।
रेणू पहुंची आत्मसंतुष्टि के द्वार।

5 thoughts on “आत्मसंतुष्टि

    1. एक निवेदन
      रचनाओं पर प्रतिक्रिया देने के लिए आपका धन्यवाद, यह अवश्य हमारे साथियों का उत्साहवर्धन करेगी और नवसृजन के लिए प्रेरित करेगी. बस एक छोटा सा निवेदन है आप सभी से कि आप अपने शहर का भी उल्लेख कर देंगे तो हमें और हमारे साथियों को लगेगा की उनकी रचनाएं कहां-कहां तक पढ़ी जा रही है.
      आपका साथी

    1. एक निवेदन
      रचनाओं पर प्रतिक्रिया देने के लिए आपका धन्यवाद, यह अवश्य हमारे साथियों का उत्साहवर्धन करेगी और नवसृजन के लिए प्रेरित करेगी. बस एक छोटा सा निवेदन है आप सभी से कि आप अपने शहर का भी उल्लेख कर देंगे तो हमें और हमारे साथियों को लगेगा की उनकी रचनाएं कहां-कहां तक पढ़ी जा रही है.
      आपका साथी

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