gulmohar

जिंदगी के पन्नों में तुम्हारा स्पर्श

मैं एक किताब थी, धूल भरी लाइब्रेरी के कोने में पड़ी हुई। पन्ने पुराने थे, कवर किसी को आकर्षित करने लायक नहीं। एक ऐसी किताब जिसे शायद ही कभी पढ़ा गया हो।

एक दिन तुम मुझसे टकराए। तुमने मुझे उठाया और पढ़ना शुरू किया। पहले पन्ने पर मेरी प्रस्तावना पढ़ते ही मुझे डर लगा कि अब तुम मेरी सोच और भावनाओं को आंक दोगे। पर जैसे ही तुमने आगे पढ़ा, तुम मुस्कुराए। तुम्हारी मुस्कान ने मुझे जिम्मेदारी का एहसास कराया – कि तुम्हें निराश नहीं होने दूँगी।

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बरसों बाद कलम उठाकर कविता लिखती महिला कवयित्री

आत्मसंतुष्टि

बरसों बाद जब रेणू ने कलम उठाई, उसके दिल और दिमाग में अजीब सी मस्ती फैल गई। शब्दों का सागर उसके भीतर गोते लगा रहा था, और दिमाग उस सागर से मोती चुनकर उन्हें पंक्तियों में सजाने में व्यस्त था। भावनाओं की लहरें उठ रही थीं, और उसकी नाव—जो कविता का रूप धारण कर चुकी थी—उन लहरों को पार कर रही थी। हर शब्द, हर भाव उसे आत्मसंतुष्टि के द्वार तक ले गया। रेणू ने महसूस किया कि लिखना केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि आत्मा की शांति का साधन भी है। उसकी नाविक बनकर, वह अपनी रचनात्मकता की शक्ति को महसूस करते हुए आत्मसंतुष्टि के द्वार पर पहुँच गई।

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