जिंदगी के पन्नों में तुम्हारा स्पर्श

ज्योति सोनी, प्रसिद्ध लेखिका, अलवर (राजस्थान)

क किताब थी मैं
किसी पुरानी, धूल भरी लाइब्रेरी
के किसी कोने में पड़ी हुई,
पन्ने मिट्टी से सने हुए थे,
कवर किसी को आकर्षित करने लायक नहीं था,
एक ऐसी विधा की किताब
जिसकी शायद ही कभी डिमांड रही हो,
हमेशा अनदेखी की गई।

एक दिन तुम टकराए मुझसे,
उठाया तुमने, देखा तुमने —
मेरा मन बेचैन,
बेचैन फिर से गलत समझे जाने को लेकर।
पढ़ने और समझने में फर्क होता है ना!

जैसे ही खोला तुमने,
लगा मुझे कि तुम जला रहे हो मुझे,
लपट थी भावनाओं की, एहसासों की,
मैं रोती रही, जलती रही।

पहले पन्ने पर मेरे जीवन की प्रस्तावना पढ़ी तुमने,
मैं डर गई —
डर कि तुम आंक दोगे मुझे अब,
आंक दोगे मुझे मेरी विचार-प्रक्रिया से।
डर में मैं सिमटी रही।

जब तुमने पढ़ा एक और पन्ना
और तुम हँस दिए धीरे से,
मुस्कुराए एक सच्ची मुस्कान के साथ,
मुझे जिम्मेदारी अनुभव हुई —
जिम्मेदारी मेरी कि तुम्हें निराश न होने दूँ।

जैसे-जैसे तुम पन्ने पलटते गए,
एक-दूजे पर विश्वास हमारा बनता गया,
मेरे शब्द तुम्हारे चेहरे पर दिखने लगे
जैसे सूखी धरती पर बारिश की
एक-एक बूँद दिखती है।

तुमने देखा मुझे अपने लिखित रूप में,
महसूस किया मुझे अपनी जिंदगी में।

समय निकल गया फिर हम दोनों के हाथ से।
तुमने मुझे करने दिया स्पर्श खुद को
और छोड़ गए अपने होठों के निशान उस पन्ने पर
जहाँ लिखा था — “समाप्त”

6 thoughts on “जिंदगी के पन्नों में तुम्हारा स्पर्श

    1. बहुत सादगीपूर्ण और संवेदनशील विषय पर सच्चाई से लिखी भावनात्मक प्रतिक्रिया है आपका यह लेख । बधाई स्वीकार कीजिए ।

      जिन्दगी को किताब जैसे अलग-अलग अनुभव के पन्नों सरीखा देखना , बहुत सुंदर कल्पना है ।

  1. बहुत सादगीपूर्ण और संवेदनशील विषय पर सच्चाई से लिखी भावनात्मक प्रतिक्रिया है आपका यह लेख । बधाई स्वीकार कीजिए ।

    जिन्दगी को किताब जैसे अलग-अलग अनुभव के पन्नों सरीखा देखना , बहुत सुंदर कल्पना है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *