एक जोड़ा चुपचाप शाम के समय एक शांत कमरे में बैठा है, पुरुष अपनी प्रेमिका के पास हाथ रखकर, दोनों के चेहरे पर कोमल भाव, हृदय की धड़कन और नज़दीकी की अनुभूति साफ़ झलक रही है।

चुपचाप, बस तुम्हारे पास

उनके साथ बिताया हर पल कुछ अलग ही होता था। न वो कुछ कहते, न ही जताते, फिर भी उनकी उपस्थिति में सब कुछ पूरा लगता। इंतजार भी मीठा लगता और दिल की धड़कन की रफ़्तार को संभालते हुए, हम बस उनके पहलू में बैठते रहते। शामें इतनी खामोशी से गुजरतीं कि शब्द भी कम पड़ जाते, और हर लम्हा अपने आप में रूह तक पहुँचने वाला एहसास बन जाता। यही वह समय था, जब मौन ही सबसे गहरी बातें कह जाता।

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ऑनलाइन की हरी बत्ती..

हर रात एक ही इंतज़ार स्क्रीन पर उसका ऑनलाइन दिखना। बातों में कुछ ख़ास नहीं, पर उस हरी बत्ती के पीछे जैसे एक रिश्ता साँस लेता है। उसकी हर “गुड मॉर्निंग” कमरे की ख़ामोशी में रोशनी भर देती है, और मैं फिर अगले इंतज़ार में डूब जाता हूँ।

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गुप्त प्रेम

मैं तुम्हें शब्दों में नहीं, तुम्हारी ख़ामोशी में चुनता हूँ। जैसे अँधेरी रात में जुगनू से रोशनी मिलती है, वैसे ही तुम मेरे भीतर उजाला भर देती हो। मैं तुम्हारे एकांत में भी तुम्हें प्रेम करता हूँ, क्योंकि वहाँ तुम सबसे सच्ची होती हो। सपनों में तुम्हारा कोई अंत नहीं होता — इसलिए तुम्हें मैं अपनी आख़िरी साँस तक माँगता रहूँगा।

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जिंदगी के पन्नों में तुम्हारा स्पर्श

मैं एक किताब थी, धूल भरी लाइब्रेरी के कोने में पड़ी हुई। पन्ने पुराने थे, कवर किसी को आकर्षित करने लायक नहीं। एक ऐसी किताब जिसे शायद ही कभी पढ़ा गया हो।

एक दिन तुम मुझसे टकराए। तुमने मुझे उठाया और पढ़ना शुरू किया। पहले पन्ने पर मेरी प्रस्तावना पढ़ते ही मुझे डर लगा कि अब तुम मेरी सोच और भावनाओं को आंक दोगे। पर जैसे ही तुमने आगे पढ़ा, तुम मुस्कुराए। तुम्हारी मुस्कान ने मुझे जिम्मेदारी का एहसास कराया – कि तुम्हें निराश नहीं होने दूँगी।

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तन भादों, मन सावन

कविता में भावनाओं का सुंदर चित्रण है। यह उन अनुभवों और एहसासों की गहनता को व्यक्त करती है जो प्रेम और मिलन से उत्पन्न होते हैं। कवि अपने प्रिय के नेह में भीगकर अपने तन और मन में सावन का अहसास महसूस करता है। उसकी नजरों में प्रिय का रूप पनीला और मोहक प्रतीत होता है, और हर अंग में प्रेम की ज्वाला फैल जाती है। हवाओं के बहने से तन और मन बहक उठते हैं, और मिलन और बिछड़ने के पल झूलों की तरह आते-जाते हैं। हवाओं के माध्यम से प्रिय के शरीर की अनुभूति से सागर का सौंदर्य और जलमयता मन में उतर जाती है। जब से प्रिय उसके जीवन में आए हैं, उसका तन और मन उनके प्यार का घर और आँगन बन गया है। उसके अंतरतम में प्रिय के बसने से तन मंदिर और मन पावन हो गया है। यह कविता प्रेम के गहन अनुभव, मिलन की तृष्णा और भावनाओं की पवित्रता को उजागर करती है

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जरा-ज़रा तू हमसे मिल

मन बार-बार उस प्रिय को पुकारता है—“जरा-सा मिलो, तनिक-सा मेरे दिल में उतर आओ।” आँखें जो कहती हैं, वही शब्दों से सुनना चाहता है। सपनों में बीती रातें और अंतस की अनकही बातें, सब उसी से जुड़ी हैं। उसका साथ वेदना हर लेता है, उसके अधरों की मुस्कान अमृत बरसाती है। यदि मिल न पाए तो हृदय तड़प-तड़प कर व्याकुल हो उठता है। अब तो चाह यही है कि वह बिना दस्तक इस जीवन में आ बसे, और परिणय के बंधन में सब कुछ स्थिर हो जाए। उसकी आँखों की गहराई में डूब जाना मानो किसी झील में समा जाना है।

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तेरी बिंदी

आज तुम्हारे भाल पर बिंदी बीचों-बीच सजनी चाहिए थी, पर तुमने उसे किनारे सरका दिया। यह कैसी गुस्ताख़ी? बस उसी को ठीक करने आया हूँ।”
उसने नंदिनी की बिंदी को मध्य में सजाया, और उसी क्षण उनकी साँसें थम-सी गईं।
रात को नंदिनी ने वही बिंदी आईने पर चिपकाते हुए धीमे से कहा—“अब यहाँ विराजिए निखिल जी… र हाँ, आँखें बंद रखना।”अगले दिन जब उसने निखिल का स्केच देखा, उस पर लिखा था—
“एक संपूर्ण रमणी नंदिनी।”

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