
अशोक व्यास, प्रसिद्ध साहित्यकार, भोपाल
तेरे नेह में भीग कर तरबतर
तन, भादों, मन सावन हो गया
देखती हो पनीली निगाहों से
अंग-अंग में जल-प्रलयण हो गया II तन, भादों…
लगी चलने जब बहकी-बहकी हवाएँ
तन बहका, मन भावन हो गया II तन, भादों…
तुमसे मिलना और बिछड़ना जैसे
झूलों का आवन-जावन हो गया II तन, भादों…
तुम्हारे बदन को छूकर जाती हवाओं से
सागर का जल लावण्य-मय हो गया II तन, भादों…
जब से तुम आए हो मन के द्वारे
तन, मन तेरा घर-आँगन हो गया II तन, भादों…
मेरे अंतरतम में तुम बसे जबसे
तन मंदिर, मन पावन हो गया II तन, भादों…
