तन भादों, मन सावन

कविता में भावनाओं का सुंदर चित्रण है। यह उन अनुभवों और एहसासों की गहनता को व्यक्त करती है जो प्रेम और मिलन से उत्पन्न होते हैं। कवि अपने प्रिय के नेह में भीगकर अपने तन और मन में सावन का अहसास महसूस करता है। उसकी नजरों में प्रिय का रूप पनीला और मोहक प्रतीत होता है, और हर अंग में प्रेम की ज्वाला फैल जाती है। हवाओं के बहने से तन और मन बहक उठते हैं, और मिलन और बिछड़ने के पल झूलों की तरह आते-जाते हैं। हवाओं के माध्यम से प्रिय के शरीर की अनुभूति से सागर का सौंदर्य और जलमयता मन में उतर जाती है। जब से प्रिय उसके जीवन में आए हैं, उसका तन और मन उनके प्यार का घर और आँगन बन गया है। उसके अंतरतम में प्रिय के बसने से तन मंदिर और मन पावन हो गया है। यह कविता प्रेम के गहन अनुभव, मिलन की तृष्णा और भावनाओं की पवित्रता को उजागर करती है

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ज़िंदगी गुनगुनाने लगी

अब ज़िंदगी मानो गुनगुनाने लगी है। हवा की धीमी-धीमी बयार की तरह इसमें मिठास घुलने लगी है। मीठे सपनों की छाँव में रात भी अलसाई-सी करवट लेती है। मन अजीबोगरीब खयाल बुनता रहता है और उजली चांदनी-सी उम्मीद सँजोए रहता है।

बातों और मुलाक़ातों का सिलसिला लगातार चलता है, फिर भी दिल के भीतर कहीं एक हल्की-सी खलिश बनी रहती है। बीते दिनों में चारों ओर दावानल था, घाव भी हरे-भरे थे। ऐसे कठिन समय में उसकी बातें मोगरे की महक जैसी सुकून देती थीं।

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वो इस जमाने का ही रहा…

मेरे हिस्से में हवाओं का  कुछ कतरा ही रहा सांस चलती रहे बस इतना मिलता रहा  मेरे मर्म से गुजरता वो  सुबह शाम रहा कभी ठहरा कभी नाकाम रहा  आदतन वो इस  जमाने का ही रहा मुंतजिर क्यों रहूं  जो कहीं और चला जबकि पता है वो  किसी का भी न रहा थपेड़ों से घायल…

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