वो इस जमाने का ही रहा…

मेरे हिस्से में हवाओं का

 कुछ कतरा ही रहा

सांस चलती रहे बस

इतना मिलता रहा 

मेरे मर्म से गुजरता वो 

सुबह शाम रहा

कभी ठहरा कभी

नाकाम रहा 

आदतन वो इस 

जमाने का ही रहा

मुंतजिर क्यों रहूं 

जो कहीं और चला

जबकि पता है वो 

किसी का भी न रहा

थपेड़ों से घायल वो जब हुआ

मेरी पर्णकुटी को  

आसरा बनाता रहा

मेरा मयार नहीं मिलता 

जरूरत से आया और 

मेरे उछंग से हर बार

गुजरता रहा

डॉ. निवेदिता श्रीवास्तव गार्गी 

जमशेदपुर झारखंड

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