gulmohar

इल्तज़ा

पंख थक गए हैं, तो एक बार मिलने आ जाओ। मैं भी कभी स्वच्छंद पंछी जैसा था। आंसुओं के समंदर को मत रोको, उन्हें वैसे ही बहने दो जैसे सावन की झड़ी बहती है। लिखे हुए खतों की सौगात शायद कोई लौटाए, लेकिन वही कमाल का जिगर ए यार होगा, जैसा मैं हूं। किताबों पर धूल जमने से कहानी नहीं बदलती, और मैं भी कभी पुरानी किताबों को पढ़ने जैसा हूं। आज तक कौन गया है इस मिट्टी के आगे? मैं भी उस धूल के मुख़्तसर ज़र्रे जैसा हूं। जानते हैं, लौटते वक्त कुछ भी साथ में नहीं ले जा सकते, फिर भी बचा लो यारों, थोड़ा सरण और कफ़न जैसा…

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वो इस जमाने का ही रहा…

मेरे हिस्से में हवाओं का  कुछ कतरा ही रहा सांस चलती रहे बस इतना मिलता रहा  मेरे मर्म से गुजरता वो  सुबह शाम रहा कभी ठहरा कभी नाकाम रहा  आदतन वो इस  जमाने का ही रहा मुंतजिर क्यों रहूं  जो कहीं और चला जबकि पता है वो  किसी का भी न रहा थपेड़ों से घायल…

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