मोहब्बत

इस अँधेरी रात में बस एक ही ख्वाहिश है ऐसा हमसफ़र मिले, जो टूटे दिल को भी सहला दे और सच के छोटे-से वादे पर पूरी उम्र साथ निभा जाए। मोहब्बत कम भी हो जाए तो चलेगा, पर भरोसे की डोर इतनी मजबूत हो कि ज़िंदगी फिर से खिल उठे। बारिश हो या काले बादल, उसके होने भर से हर पल में सुकून उतर आए।

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एहतियात कैसी ?

सपने सदियों से कल्पना के आसमान में उड़ान भरते आए हैं और हर बार यथार्थ की धरती पर लौटकर हमें यही सिखाते हैं. जब दिल सच्चा हो, तो एहतियात की कैसी गुंजाइश? एक मुट्ठी आसमान, शबनम का छोटा-सा कतरा इन छोटी-सी चीज़ों में भी प्रेम दरिया बनकर उमड़ आता है।

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किराए की खुशियाँ

कभी-कभी हम ऐसी खुशियों का इंतज़ार करते रहते हैं, जो हमारी ज़िंदगी में किराए की तरह आती हैं. कुछ समय रुकती हैं और फिर चली जाती हैं। हम जानते हैं कि वे स्थायी नहीं हैं, फिर भी दिल उन्हें पाने की उम्मीद करता रहता है। इस रिश्ते में भी यही हुआ। ख़ामोशी हमारी भाषा थी, नज़रें संवाद थीं, और उम्मीद हमारा सहारा। हमने अपनी ओर से सब कुछ दाँव पर लगा दिया, लेकिन साथ नहीं मिला। अब वही इंसान, जिसके साथ एक घर बसाने का सपना था, हर बात पर तकरार करता है, और बेरुख़ी को स्वीकार करता है जैसे ये उसकी नई आदत हो।

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मिलना उसे जो ढूंढने आएगा

एक अधूरी-सी दोस्ती, अनकहे जज़्बात और अचानक हुई गुमशुदगी…खोजते-खोजते वह वहीं पहुँचा जहाँ कभी उसने कहा था “याद आऊँ तो रेवा के तट पर आ जाना।” ढलते सूरज, ठंडी हवा और आधी शॉल में समा जाने वाली इस मुलाक़ात में प्रेम ने चुपचाप अपनी जगह फिर से पा ली।

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एक विरह ऐसा भी…

वियोग के उस क्षण में कवि को उसकी आँखों में प्रेम और आत्मीयता दोनों दिखाई देते हैं। बिछड़ते समय दोनों ने कुछ न कुछ खोया था. एक ने उदासी को सहा, दूसरे ने निश्चय को अपने होंठों पर थामे रखा। इस टूटते हुए रिश्ते के बीच भी कवि के भीतर एक मौन विश्वास जन्म लेता है कि प्रेम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

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दास्तान ए जिंदगी

दास्तान-ए-ज़िंदगी” उस कहानी को बयां करती है जो काग़ज़ पर नहीं, आँखों की नमी में लिखी जाती है। जज़्बात कभी शब्द बनकर नहीं उतरते—वे खून की जुबान में अपनी दास्तान सुनाते हैं। चाँद को दिल में सँभाल कर रखने की मासूम हिदायत है, क्योंकि उसकी चाँदनी भी शरमाती है। रात की वीरानी, सूने सपने और ख़ामोश गलियाँ एक अकेलेपन का नक्श बनाती हैं। फिर भी किसी की मुस्कुराहट दिल की धड़कनों में रवानी भर देती है।

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किसी की आहट… कोई तो है

रात की नीरवता में मन बार-बार किसी अज्ञात उपस्थिति को महसूस करता है. जैसे कोई अदृश्य कदमों से मन के आँगन तक आ पहुँचा हो। पहचान स्पष्ट नहीं, पर एहसास गहरा है। कोई है… जिसकी आहट, जिसकी परछाईं, जिसकी अनकही मौजूदगी दिल को बेचैन भी करती है और आकर्षित भी। मन बार-बार उसी ओर खिंचता है.

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ऑनलाइन की हरी बत्ती..

हर रात एक ही इंतज़ार स्क्रीन पर उसका ऑनलाइन दिखना। बातों में कुछ ख़ास नहीं, पर उस हरी बत्ती के पीछे जैसे एक रिश्ता साँस लेता है। उसकी हर “गुड मॉर्निंग” कमरे की ख़ामोशी में रोशनी भर देती है, और मैं फिर अगले इंतज़ार में डूब जाता हूँ।

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मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ… बस एक बार

रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर आज अमर और सुहानी ने एक क़ैफे में मिलने का तय किया था…अमर आज किसी कारण से सुहानी के शहर आया हुआ था.अमर और सुहानी पहली बार मिलने वाले थे…..अमर ने सुहानी से कई बार मिलने की रिक्वेस्ट की थी. शायद वैसे ही कह दिया करता था, क्योंकि वो भी…

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गुप्त प्रेम

मैं तुम्हें शब्दों में नहीं, तुम्हारी ख़ामोशी में चुनता हूँ। जैसे अँधेरी रात में जुगनू से रोशनी मिलती है, वैसे ही तुम मेरे भीतर उजाला भर देती हो। मैं तुम्हारे एकांत में भी तुम्हें प्रेम करता हूँ, क्योंकि वहाँ तुम सबसे सच्ची होती हो। सपनों में तुम्हारा कोई अंत नहीं होता — इसलिए तुम्हें मैं अपनी आख़िरी साँस तक माँगता रहूँगा।

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