महफ़िल अदब की

हर उड़ान को एक डोर चाहिए — जैसे हर रिश्ते को भरोसा।
बिना उस जोड़ के, कोई पतंग ऊँचाइयों तक नहीं पहुँचती, जैसे बिना बरसात के कोई मोर नहीं नाचता।
मेरे लिए मंज़िल वही है जहाँ तुम हो; और जो राह तुम्हारी ओर न जाती हो, उसे चुनने का कोई अर्थ नहीं।
दिल पर ज़ोर चलाने की बातें बस किताबों में अच्छी लगती हैं — हक़ीक़त में तो हर इंसान अपनी दबाई हुई ख़्वाहिशों का कैदी है।
यह महफ़िल अदब की है, यहाँ शब्दों से शोर नहीं, रोशनी फैलानी होती है — सुख़न की शम्मअ जलानी होती है। कभी नज़रों से, कभी दिल से लोग चुराते रहते हैं —

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ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे

मधु झुनझुनवाला ‘अमृता‘ प्रसिद्ध साहित्यकार, जयपुर (राजस्थान) मुंतज़िर थे हमीं न कल होंगे ।ये लम्हे क्या कभी अज़ल होंगे । फ़िक्र अब है कहाँ मुहब्बत में,ज़ीस्त में क्यों सनम दख़ल होंगे । दिल बुझेंगे कभी जो फुर्कत में,ख़्वाहिशों के न फिर महल होंगे । बाद मेरे इन्हीं निगाहों में ,अश्क़ में तर हसीं कँवल होंगे…

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नैनों के दर्पण में

“नैनों के दर्पण में तेरी तस्वीर उभरती है, तेरे बिना हर पल वीरान लगता है। तेरी यादों का जादू मेरे दिल में बसा है, और तेरी खुशबू हवाओं में घुलकर मेरी दुनिया को रंगीन बना देती है।”

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तन भादों, मन सावन

कविता में भावनाओं का सुंदर चित्रण है। यह उन अनुभवों और एहसासों की गहनता को व्यक्त करती है जो प्रेम और मिलन से उत्पन्न होते हैं। कवि अपने प्रिय के नेह में भीगकर अपने तन और मन में सावन का अहसास महसूस करता है। उसकी नजरों में प्रिय का रूप पनीला और मोहक प्रतीत होता है, और हर अंग में प्रेम की ज्वाला फैल जाती है। हवाओं के बहने से तन और मन बहक उठते हैं, और मिलन और बिछड़ने के पल झूलों की तरह आते-जाते हैं। हवाओं के माध्यम से प्रिय के शरीर की अनुभूति से सागर का सौंदर्य और जलमयता मन में उतर जाती है। जब से प्रिय उसके जीवन में आए हैं, उसका तन और मन उनके प्यार का घर और आँगन बन गया है। उसके अंतरतम में प्रिय के बसने से तन मंदिर और मन पावन हो गया है। यह कविता प्रेम के गहन अनुभव, मिलन की तृष्णा और भावनाओं की पवित्रता को उजागर करती है

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इल्तज़ा

पंख थक गए हैं, तो एक बार मिलने आ जाओ। मैं भी कभी स्वच्छंद पंछी जैसा था। आंसुओं के समंदर को मत रोको, उन्हें वैसे ही बहने दो जैसे सावन की झड़ी बहती है। लिखे हुए खतों की सौगात शायद कोई लौटाए, लेकिन वही कमाल का जिगर ए यार होगा, जैसा मैं हूं। किताबों पर धूल जमने से कहानी नहीं बदलती, और मैं भी कभी पुरानी किताबों को पढ़ने जैसा हूं। आज तक कौन गया है इस मिट्टी के आगे? मैं भी उस धूल के मुख़्तसर ज़र्रे जैसा हूं। जानते हैं, लौटते वक्त कुछ भी साथ में नहीं ले जा सकते, फिर भी बचा लो यारों, थोड़ा सरण और कफ़न जैसा…

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देहरियों के पार..

एक स्त्री (या प्रतीक्षारत आत्मा) आकाश की नीली छाँव और हरियाली की गोद में खड़ी है। वह एक वृक्ष का सहारा लिए सदियों से प्रतीक्षा कर रही है—अपने चितचोर (प्रिय/प्रियतम) की खोज में। उसकी आँखें अपलक रास्ता निहार रही हैं और कान पदचाप की आहट सुनने को आतुर हैं।

समय गुज़रता गया, परंतु उसकी प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई। वह खुद को एक प्यासी नदी की तरह अनुभव करती है, जो कभी अमृत-सरीखी धारा बहाती थी, पर अब सूख चुकी है। फिर भी उसके भीतर यह विश्वास बना हुआ है कि उसका प्रिय अवश्य आएगा। यही एक सपना उसकी आँखों की रोशनी और मन की गर्माहट बनाए रखता है।

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ठहर न सका वो प्रेम

सुबह का नशा धीरे-धीरे चढ़ा तो था, लेकिन शाम तक उतर गया। यह प्रेम भी कुछ वैसा ही था—जिसे टिकना चाहिए था, पर ठहर न सका। अजीब बात यह रही कि उसे भी तलाश थी और मुझे भी, लेकिन जब वह सामने खड़ा था, तब भी पता नहीं क्यों वह न जाने कहाँ गुम हो गया।

इसके बाद न कोई तलब बची, न कोई बेक़रारी। सब कुछ जैसे अचानक खत्म हो गया और मेरे भीतर की बेचैनियों को किसी ने एक ही पल में कुतर डाला। मुझे याद है, शायद वह कोई फकीर ही रहा होगा, जिसकी उपस्थिति ने मेरे मन को इस कदर सँवार दिया कि सब कुछ बदल गया।

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ज़िंदगी गुनगुनाने लगी

अब ज़िंदगी मानो गुनगुनाने लगी है। हवा की धीमी-धीमी बयार की तरह इसमें मिठास घुलने लगी है। मीठे सपनों की छाँव में रात भी अलसाई-सी करवट लेती है। मन अजीबोगरीब खयाल बुनता रहता है और उजली चांदनी-सी उम्मीद सँजोए रहता है।

बातों और मुलाक़ातों का सिलसिला लगातार चलता है, फिर भी दिल के भीतर कहीं एक हल्की-सी खलिश बनी रहती है। बीते दिनों में चारों ओर दावानल था, घाव भी हरे-भरे थे। ऐसे कठिन समय में उसकी बातें मोगरे की महक जैसी सुकून देती थीं।

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इस बार मैं चुप रहूंगी

उस दिन एक स्पर्श हवा में ठहर-सा गया था, ठीक उसी क्षण जब शब्दों ने जन्म लेना ही चाहा था। तुम्हारी बात सिर्फ मेरे कानों तक नहीं पहुँची, वह सीधे भीतर तक उतर आई थी। मगर भाषा की गलियाँ उन दिनों बहुत संकरी थीं। खिड़की आधी ही खुली थी और बादलों ने कोई वादा नहीं किया था—न थमने का, न बरसने का।

स्मृति आज भी वहीं अटकी है, जहाँ तुमने मुझे बिना कुछ कहे देखा था। उस शाम समय बहुत तेज़ी से गुज़र गया था, या शायद वह ऊबकर किनारे खड़ा रह गया था। मुझे लगा था कि तुम कुछ कहना चाहते हो, और मैं अपनी घबराहट में, कुछ न कहकर भी सब कुछ कह चुकी थी। अब अगर तुम फिर से मिलो, तो मैं इस बार चुप रहूँगी। कुछ नहीं कहूँगी—बस तुम्हें लिख दूँगी। और अगर हो सके, तो तुम बस पढ़ लेना।

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ग़ज़ल

दिल-ए-नादाँ को रुसवा क्यों करें हम,ज़माने से यूँ शिकवा क्यों करें हम। हमारे दर्द को समझे नहीं वो,तो अपने मन को मैला क्यों करें हम। उन्हें बेपर्दगी का पास है जब,भला फिर उनसे पर्दा क्यों करें हम। जिसे परवाह उलफ़त की नहीं अब,उसी पर वक़्त ज़ाया क्यों करें हम। मुहब्बत कर ली क्या, आफ़त बुला…

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