नैनों के दर्पण में

डॉ. शशिकला पटेल असिस्‍टेंट प्रोफेसर (मुलुंड पूर्व) मुंबई

नैनों के दर्पण में
मनवा खाए हिचकोले जब-जब बहे समीर,
शीतलता महसूस करे ज्यों सागर में नीर।
तेरे आने की आहट में मचल उठे अरमाँ,
नैनों के दर्पण में उभर गई तेरी तस्वीर।

हर एक पल तेरे बिना लगता जैसे वीरान,
दिल में बसा रहे तुझसे मिलने का अरमान।
हर रेशमी लहर में तेरी यादों का जादू,
मेरे दिल में बन बैठा तू बिन बोले मेहमान।

सपनों में खो जाती हूँ जब भी तू है पास,
तेरे बिना तो ये दुनिया भी तन्हा, लगे निराश।
हर पल बढ़ते ही जाते अरमाँ तुझ संग जीने के,
तेरी आँखों की गहराई में समा जाने की आस।

हवाओं में घुल जाती तेरी खुशबू हर वक्त,
लाता है ख़्याल तेरा एक नई रोशनी।
तेरे बिना तो मेरी धड़कन भी थम-सी जाती,
तेरे ख़्यालों से ही मेरी दुनिया रंगीन बनी।

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