ऐसे न तुम रूठा करो
कुछ गिला कुछ बात कुछ शिकवा करो… जाने जां ऐसे न तुम रूठा करो।” तकरार और मोहब्बत के बीच झूलती यह पंक्तियाँ रिश्तों की उस नाज़ुक दूरी को छूती हैं जहाँ रूठना भी प्रेम का हिस्सा है।

कुछ गिला कुछ बात कुछ शिकवा करो… जाने जां ऐसे न तुम रूठा करो।” तकरार और मोहब्बत के बीच झूलती यह पंक्तियाँ रिश्तों की उस नाज़ुक दूरी को छूती हैं जहाँ रूठना भी प्रेम का हिस्सा है।
मैं तुम्हें शब्दों में नहीं, तुम्हारी ख़ामोशी में चुनता हूँ। जैसे अँधेरी रात में जुगनू से रोशनी मिलती है, वैसे ही तुम मेरे भीतर उजाला भर देती हो। मैं तुम्हारे एकांत में भी तुम्हें प्रेम करता हूँ, क्योंकि वहाँ तुम सबसे सच्ची होती हो। सपनों में तुम्हारा कोई अंत नहीं होता — इसलिए तुम्हें मैं अपनी आख़िरी साँस तक माँगता रहूँगा।
“नैनों के दर्पण में तेरी तस्वीर उभरती है, तेरे बिना हर पल वीरान लगता है। तेरी यादों का जादू मेरे दिल में बसा है, और तेरी खुशबू हवाओं में घुलकर मेरी दुनिया को रंगीन बना देती है।”
तेरी यादें जब भी उठती हैं तो सैलाब-सी बनकर मन को बहा ले जाती हैं। आँखों से आँसुओं के कतरे ढलते हैं, और हर कण में तेरा ही नूर झलकता है। तू अपनी जुल्फ़ों से बहारों को महकाती है, इंद्रधनुष-सी रंगीन चूनर लहराती है और चांदनी रातों को मधुशाला बना देती है। जितना तुझे भूलने की कोशिश करता हूँ, उतनी ही गहराई से तू याद आती है।
दिल-ए-नादाँ को रुसवा क्यों करें हम,ज़माने से यूँ शिकवा क्यों करें हम। हमारे दर्द को समझे नहीं वो,तो अपने मन को मैला क्यों करें हम। उन्हें बेपर्दगी का पास है जब,भला फिर उनसे पर्दा क्यों करें हम। जिसे परवाह उलफ़त की नहीं अब,उसी पर वक़्त ज़ाया क्यों करें हम। मुहब्बत कर ली क्या, आफ़त बुला…