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ऐसे न तुम रूठा करो

अर्चना वर्मा सिंह, मुंबई

कुछ गिला कुछ बात कुछ शिकवा करो
जाने जां ऐसे न तुम रूठा करो।

डगमगा जाऊँ न मैं तन्हाई में
आके पहलू में मेरे बैठा करो।

इश्क़ में तकरार भी है लाजमी
दिल पे लेने से चलो तौबा करो।

गर यक़ीं अब भी नहीं मुझ पे सनम
तो चलो फिर ख़त्म ये किस्सा करो।

अब सुकूँ से ‘अर्चना’ को रहने दो
मत मुसाफ़िर माज़ी के पीछा करो।

One thought on “ऐसे न तुम रूठा करो

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