दिल, दर्द और दमखम
यह ग़ज़ल इंसानी समझ, रिश्तों की पेचीदगियों, आत्मसम्मान और देशप्रेम के सूक्ष्म भावों को बेहद नफ़ासत से पिरोती है। कभी दुनिया की चालाकियों पर तीखा सवाल उठाती है, तो कभी अपने ही घावों को मरहम की तरह सँभाल लेने का सलीका दिखाती है। इश्क़ की कोमल धड़कनों से लेकर हमदम और रकीब की पहचान तक हर शेर एक अलग दुनिया खोलता है। अंतिम शेर ग़ज़ल को असाधारण ऊँचाई देता है, जहाँ धर्म से ऊपर उठकर वतन को सर्वोपरि माना गया है। यह सिर्फ शायरी नहीं, जीवन के अनुभवों की तराशी हुई सच्चाई है।
