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•••साहित्य अकादमी की चारों पीठ पर निदेशक नियुक्त

प्रेमचंद सृजन पीठ पर व्यंग्यकार मुकेश जोशी निदेशक मनोनीत

इंदौर से वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा की लाइव वॉयर न्यूज के लिए रिपोर्ट

साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश के अंतर्गत चार सृजन पीठ कार्यरत रहती हैं। इन चारों पीठ पर निदेशकों की नियुक्ति करते हुए प्रेमचंद सृजन पीठ पर उज्जैन के ही लेखक-व्यंगयकार मुकेश जोशी को निदेशक मनोनीत किया है। इस पद पर पिछले चार साल से अनीता पंवार पदस्थ रहीं लेकिन इन चार सालों में लगा ही नहीं कि इस पीठ की साहित्यिक गतिविधियों से कोई ताल्लुक भी है।

मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव, संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र लोधी द्वारा मुकेश जोशी को प्रेमचंद सृजन पीठ, मुक्तिबोध सृजन पीठ सागर के निदेशक के रूप में डॉ. ऋषि कुमार मिश्र, बच्चों के लिए और बाल साहित्य को समर्पित बाल साहित्य सृजन पीठ के निदेशक के रूप में भोपाल की प्रख्यात बाल साहित्यकार डॉ. मीनू पांडे को निदेशक मनोनीत किया है।भोपाल स्थित निराला सृजन पीठ की निदेशक के रूप में पूर्व से ही साधना बलवटे कार्यरत हैं।

साहित्य अकादमी निदेशक डॉ विकास दवे ने बताया इन सृजन पीठ पर अनेक वरिष्ठ साहित्यकार पदस्थ होते रहे हैं। इनमें नरेश मेहता से लेकर कृष्ण कुमार अष्ठाना और डॉक्टर देवेंद्र दीपक से लेकर रामेश्वर मिश्र पंकज जी तक अनेक साहित्य धर्मी दायित्व का निर्वाह करते रहे। दुर्भाग्य से अनेक वर्षों से ऐसा कम ही हुआ कि चारों सृजन पीठ पर निदेशकों की पूर्ति रहे।

इस प्रतिष्ठित पीठ को देश के स्वनामधन्य साहित्यकारों सर्वश्री शमशेरबहादुर सिंह, नरेश मेहता, डॉ मन्नू भंडारी, तार सप्तक के कवि प. हरिनारायण व्यास, प्रो. चंद्रकांत देवताले, जगदीश तोमर, जीवनसिंह ठाकुर जैसे सुधि विद्वान सुशोभित कर चुके हैं किंतु उज्जैन मूल के कोई भी साहित्यकार यहां मनोनीत नहीं हो सके। मुकेश जोशी उज्जैन के पहले साहित्यकार हैं जिन्हें इस पीठ का निदेशक नियुक्त किया है। संस्कृति परिषद की इन पीठों की स्थापना लेखक, कवियों को अपने स्वतंत्र सृजन हेतु की गई थी कि इन चेयर पर बैठे साहित्यिकजन अपने सृजन को निर्बाध रूप से करते हुए नए आयाम दे सकें।

🔹चार साल गुमनाम रही प्रेमचंद पीठ
उज्जैन की प्रेमचंद सृजन पीठ पर कई गुमनाम लोग भी निदेशक रहे और बिना हो हल्ले के भूतपूर्व भी हो गए। तत्कालीन संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर ने बड़ी उम्मीद से अनीता पंवार को निदेशक बनाया था। उनका लेखन- साहित्य से कोई नाता भले ही नहीं रहा लेकिन निदेशक रहते इतने कार्यक्रम भी नहीं कराए जिससे स्थानीय साहित्यकारों को यह लगे कि यह पीठ उज्जैन में ही स्थापित है।

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