आत्मा का समर्पण
हिमालय की गोद में जन्मी पार्वती के मन में केवल महादेव का ही नाम बसा था। उन्होंने कठोर तपस्या और अटूट विश्वास के साथ हर क्षण शिव को पुकारा। ऋतुएँ बदलती रहीं, समय बीतता रहा, पर उनका संकल्प कभी नहीं डगमगाया।
कैलाश पर समाधि में लीन शिव के भीतर भी एक सूक्ष्म स्पंदन था, जो पार्वती की भक्ति को महसूस कर रहा था। जब दोनों की दृष्टि मिली, तो वह मिलन केवल प्रेम नहीं, बल्कि आत्मा के पूर्ण समर्पण का प्रतीक बन गया जहाँ ‘मैं’ समाप्त होकर ‘हम’ का जन्म होता है।शिव और पार्वती का यह संग सृष्टि का आधार है, जो प्रेम, विश्वास और ऊर्जा का अनंत प्रकाश फैलाता है।
