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एक + एक = हम

एक + एक = हम। जहाँ तर्क थक जाता है, वहाँ तुम्हारा नाम मेरी धड़कन बन जाता है।

सुरभि ताम्रकार, लेखिका, दुर्ग

गणित पढ़ाः था हमने,
अंक गिने, समीकरण सुलझाए,
पर तुम्हें देखकर समझ आया
कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं
जिनका कोई हल नहीं,
बस अनुभव होता है|
कविताएँ शब्दों से बनती हैं,
शब्द अर्थ खोजते हैं,
पर तुम्हारी मुस्कान
बिना शब्दों के
पूरी कविता कह जाती है|
गैलीलियो, तुम सच कहते हो
ईश्वर ने ब्रह्मांड
गणित की भाषा में लिखा है,
पर मेरे हृदय का आकाश
उसने प्रेम की स्याही से रचा है|
प्रेम को गणित मत समझो,
यहाँ उत्तर निश्चित नहीं होते,
यहाँ हर दिन
नया मान बदलता है,
और फिर भी
समीकरण पूरा रहता है|
प्रेम विज्ञान नहीं है,
जो प्रयोगशाला में
सिद्ध हो जाए,
यह तो वह सत्य है
जो आँख बंद करने पर
और स़ाफ दिखता है|

समाज इसे स्वीकार नहीं करता,
अर्थशास्त्र इसे लाभ-हानि में तौलता है,
भूगोल इसे सीमाओं में बाँधता है,
दर्शन इसे मतों में उलझाता है
पर प्रेम
इन सबसे बड़ा होता है|

प्रेम मौसम नहीं है,
जो बदल जाए,
यह तो वह ऋतु है
जो भीतर ठहर जाती है|
हाँ, प्रेम आध्यात्म हो सकता है,
क्योंकि जब तुम पास होते हो
मैं स्वयं से मुक्त हो जाती हूँ,
अहंकार गिर जाता है,
और मैं…
स़िर्फ प्रेम रह जाती हूँ|

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