romance
खामोशी का बोलता सफर
बीस साल बाद एक ट्रेन के कंपार्टमेंट में हुई ये आकस्मिक मुलाकात जहाँ न शब्द थे, न शिकायते सिर्फ वही पुरानी खुशबू, वही मोहब्बत और दो लोगों के बीच पसरी खामोशी, जो बोलती तो थी… मगर सिर्फ दिलों में
मिलना उसे जो ढूंढने आएगा
एक अधूरी-सी दोस्ती, अनकहे जज़्बात और अचानक हुई गुमशुदगी…खोजते-खोजते वह वहीं पहुँचा जहाँ कभी उसने कहा था “याद आऊँ तो रेवा के तट पर आ जाना।” ढलते सूरज, ठंडी हवा और आधी शॉल में समा जाने वाली इस मुलाक़ात में प्रेम ने चुपचाप अपनी जगह फिर से पा ली।
दास्तान ए जिंदगी
दास्तान-ए-ज़िंदगी” उस कहानी को बयां करती है जो काग़ज़ पर नहीं, आँखों की नमी में लिखी जाती है। जज़्बात कभी शब्द बनकर नहीं उतरते—वे खून की जुबान में अपनी दास्तान सुनाते हैं। चाँद को दिल में सँभाल कर रखने की मासूम हिदायत है, क्योंकि उसकी चाँदनी भी शरमाती है। रात की वीरानी, सूने सपने और ख़ामोश गलियाँ एक अकेलेपन का नक्श बनाती हैं। फिर भी किसी की मुस्कुराहट दिल की धड़कनों में रवानी भर देती है।
तन भादों, मन सावन
कविता में भावनाओं का सुंदर चित्रण है। यह उन अनुभवों और एहसासों की गहनता को व्यक्त करती है जो प्रेम और मिलन से उत्पन्न होते हैं। कवि अपने प्रिय के नेह में भीगकर अपने तन और मन में सावन का अहसास महसूस करता है। उसकी नजरों में प्रिय का रूप पनीला और मोहक प्रतीत होता है, और हर अंग में प्रेम की ज्वाला फैल जाती है। हवाओं के बहने से तन और मन बहक उठते हैं, और मिलन और बिछड़ने के पल झूलों की तरह आते-जाते हैं। हवाओं के माध्यम से प्रिय के शरीर की अनुभूति से सागर का सौंदर्य और जलमयता मन में उतर जाती है। जब से प्रिय उसके जीवन में आए हैं, उसका तन और मन उनके प्यार का घर और आँगन बन गया है। उसके अंतरतम में प्रिय के बसने से तन मंदिर और मन पावन हो गया है। यह कविता प्रेम के गहन अनुभव, मिलन की तृष्णा और भावनाओं की पवित्रता को उजागर करती है
ठहर न सका वो प्रेम
सुबह का नशा धीरे-धीरे चढ़ा तो था, लेकिन शाम तक उतर गया। यह प्रेम भी कुछ वैसा ही था—जिसे टिकना चाहिए था, पर ठहर न सका। अजीब बात यह रही कि उसे भी तलाश थी और मुझे भी, लेकिन जब वह सामने खड़ा था, तब भी पता नहीं क्यों वह न जाने कहाँ गुम हो गया।
इसके बाद न कोई तलब बची, न कोई बेक़रारी। सब कुछ जैसे अचानक खत्म हो गया और मेरे भीतर की बेचैनियों को किसी ने एक ही पल में कुतर डाला। मुझे याद है, शायद वह कोई फकीर ही रहा होगा, जिसकी उपस्थिति ने मेरे मन को इस कदर सँवार दिया कि सब कुछ बदल गया।
तुम्हारे बाद भी, तुम्हारी निशानियाँ
तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी हर छोड़ी हुई चीज़—कपड़े, प्याली, तौलिया—मुझे तुम्हारी याद दिलाती है। तुम बिखेरते जाते हो और मैं उन्हें जतन से सहेजती जाती हूँ, क्योंकि इन्हीं में हमारा रिश्ता साँस लेता है।”
सुनो ना…
वह कहती है—मत करो मुझे इतना प्यार, क्योंकि हमें पता है कि हमारा साथ अब लंबा नहीं है। फिर भी वह चाहती है कि इन कुछ पलों में वह सब समेट ले—सिंदूरी शाम, तारों से भरी चांदनी रात, भीनी-भीनी हवाएँ और उसका हाथ थामे उसकी मुस्कुराहट। उसकी चाहत बस इतनी है कि जब विदा का समय आए, तो उसकी आँखों में आंसुओं की जगह मुस्कान हो, और उसके जीवन का पिंजरे में बंधा पाखी उसी मुस्कान से मुक्त हो सके।
चांद को ग्रहण
चाँद को ग्रहण लगने की बात केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि भावनाओं और विश्वासों से जुड़ी है। प्रेम का प्रतीक यह चाँद कभी उपहास का पात्र नहीं बन सकता। सच तो यह है कि चाँद को ग्रहण नहीं, बल्कि नज़र लगती है—क्योंकि हर पूर्णिमा को पूरी दुनिया उसे निहारती है, उसकी सुंदरता को नज़र भर-भरकर देखती है। यही कारण है कि कभी वह बादलों में छिप जाता है, तो कभी लोग उसे नज़र उतरने के लिए दुआओं और टोटकों में बाँध देते हैं। वास्तव में चाँद सदा निर्मल है, ग्रहण तो हमारी धारणाओं का है।
