चांद को ग्रहण लगा!!!
कब कैसे और क्यूं लगा?
क्या चांद को भी ग्रहण लगता है भला
सारी दुनिया को देता जो उजास,
उसका यह कैसा उपहास।
चांद के नाम
अब कैसे गढ़े जायेंगे छंद
और क्या होगा प्यार करने वालों का
ढाईअक्षर का प्रेम और ढाई अक्षर का चांद
किससे तुलना करेंगे
अपने अपने प्यार की
और कैसे भेजें जायेंगे संदेश ?
जिनके पिया बसे परदेस।
नहीं चांद को ग्रहण नहीं लगना था… पर लग तो गया..
सुनो चांद को ग्रहण नहीं लगा…
चांद को ग्रहण कभी नहीं लगता,
अजी चांद को तो
नज़र लगती है नज़र..
तो और क्या
हर पूरनमासी पर
सारी दुनिया इसके पीछे पड़ जाती है
हाथ धोकर
कितना बचेगा आखिर
अपना चांद भी
बादल के पल्लू में छिप छिपकर
जी आयें ज़रा राई नून लेकर
लगे हाथ
अलाए बलाएं भी ले लिजो,
आखिर घूर घूरकर देखते हैं जो,
जी ग्रहण नहीं लगा मेरे गोरे गोरे
चांद गोलमटोल को।
नज़र लगी है
पूछें जरा
अपने दिल को टटोल कर।

प्रीति प्रधान, प्रसिद्ध कवयित्री

बहुत सुंदर लिखा है maam
जी बहुत बहुत धन्यवाद
चांद को ग्रहण लगा तो साहित्य अधूरा हो जाएगा और क्या होगा प्यार करने वालों का ?
ढाईअक्षर का प्रेम और ढाई अक्षर का चांद
किससे तुलना करेंगे अपने प्यार की ?
और कैसे भेजें जायेंगे संदेश ?
जिनके पिया बसे परदेस।
इससे अच्छा है उसकी ” नज़र उतार ” कर, उसे पहले की तरह सुंदर संदेश वाहक बना दें ।
लेखिका की बहुत सुंदर कल्पना है ।
बधाई इतने संवेदनशील लेखन के लिए ।
आहा..कितनी अच्छी टिप्पणी और कितना सुंदर दृष्टिकोण .बहुत बहुत धन्यवाद