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मन के भाव..

न के भीतर जन्म लेने वाले भाव ही रचना का आधार बनते हैं। रचनाकार हो, कलाकार हो या चित्रकार—हर सृजन उसी सूक्ष्म अनुभूति से आकार पाता है, जो मन में आहिस्ता से जन्म लेती है।
प्रकृति और परमात्मा ने इस सृष्टि में संतुलन रचा, पर जब मनुष्य अपने ही खुमार और कामना में डूब जाता है, तो यही संतुलन टूटने लगता है। जल, वायु और धरती का दूषित होना किसी बाहरी शत्रु की नहीं, बल्कि मानव की अपनी भूल की कहानी है।

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रंग–रंग में बसा जीवन

जीवन को रंगों ने हमेशा ही नए अर्थ और नई दिशा दी है। लाल रंग माँ की बिंदी की तरह स्नेह और खुशियों का संदेश देता है, हरा रंग धरती की हरियाली बनकर मन में शीतलता और समृद्धि का भाव जगाता है। नीला रंग आसमान की तरह मन को उड़ान और शांति दोनों देना जानता है, जबकि सफ़ेद रंग सरस्वती की पवित्रता में ज्ञान और सादगी का प्रतीक बन जाता है। भगवा रंग सनातन संस्कृति की जड़ से जोड़कर जीवन में अनुशासन और संस्कारों का उजास भरता है। हर रंग अपनी अलग महिमा लिए हुए है और हर रंग जीवन को किसी न किसी रूप में सम्पन्न और सार्थक बनाता है।

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“अस्तित्व”

“दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों की राहों में भी, छोटे-छोटे क्षण और यादें हमारे अस्तित्व को जीने का साहस और संबल देती हैं। गुप्तधन जैसे नन्हा दीपक, उड़ते पंछी, यादों की कुप्पी—ये सब हमें जीवन की छोटी-छोटी खुशियों और अपने अस्तित्व के साथ जुड़ने का अनुभव कराते हैं।

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फ़िरोज़ी मफ़लर

नवंबर की पीली शामों में अकेले बाहर न निकलो। इस महीने की धूप छलावा है—तुम उसकी गुनगुनी ऊँगली पकड़कर चलते रहोगे, और वह अचानक किसी और के साथ भाग जाएगी। फिर तुम्हें रास्ता भी नहीं मिलेगा, क्योंकि सूखे पत्तों के बीच हमेशा हरे-भरे पत्ते खो जाते हैं।

ठहरो… कहा तो था कि हम तुम्हारे साथ चलेंगे। पिछले बरस का तुम्हारा अधूरा फ़िरोज़ी मफलर अब बुनाई के अंतिम मोड़ पर है। आओ, मिलकर सर्दियों की तैयारियाँ करें—हम दोनों साथ।

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मोह और प्रेम

लिखने को कुछ नहीं था, परंतु शब्द मस्तिष्क में ऐसे कुलबुला रहे थे मानो बाहर आने को व्याकुल हों।
मन के दो छोर सामने थे—एक ओर मोह, जो मुट्ठी में क़ैद था, और दूसरी ओर प्रेम, जो आज़ाद पंछी की तरह उड़ना चाहता था। यह विडंबना ही थी कि प्रेम ने ही मोह को जन्म दिया, फिर भी उसी की कैद प्रेम को असह्य हो गई।मोह के भीतर संदेह के जीवाणु पलते रहे, जिन्हें प्रेम ने कभी स्वीकार नहीं किया।प्रेम बसंत की शुरुआत था—नवजीवन का उत्सव, जबकि मोह पतझड़ का सूना संदेश।
प्रेम उमड़ते समंदर की लहर था, मोह रेत का वह कण, जो मुट्ठी में थमता ही नहीं और फिसल जाने को आतुर रहता है।

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ऐ वक्त कुछ पल ठहर जा…

ऐ वक्त, ज़रा ठहर तो सही। सदियों से मन में पलते प्रश्न तेरी तेज़ रफ़्तार के कारण अनकहे रह जाते हैं। मैं पूछना चाहती हूँ—कहाँ खो गई वह दुनिया, जहाँ हरियाली और खुशहाली थी, जहाँ पशु-पक्षियों तक में प्रेम और उल्लास था। सूरज की किरणों में वात्सल्य झलकता था, चाँदनी में प्रीत का अहसास बिखरा रहता था।

आज सब कुछ बदल गया है। इंसान इंसान का दुश्मन बन बैठा है, भावनाएँ सूख गई हैं, हमदर्दी लुप्त हो गई है और खुदगर्जी ही राज कर रही है। न मौसम ठीक है, न प्रकृति। हरियाली मिट रही है, खुशहाली खो रही है। इंसानियत बिन मौत ही मर रही है।

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चरैवेति का अर्थ

चरैवेति – चलना मनुष्य का धर्म है। घुमक्कड़ी केवल यात्रा नहीं, बल्कि जिज्ञासा, अनुभव और आत्मशक्ति का मार्ग है। आदिम मनुष्य से लेकर आधुनिक घुमक्कड़ों तक, हर कदम हमें प्रकृति, समाज और संस्कृति से जोड़ता है। यही जिज्ञासा हमें नई कल्पनाओं और अंतहीन संभावनाओं की ओर ले जाती है।”

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घर…

मैंने अपना घर किसी ईंट-पत्थर की दीवारों पर नहीं, बल्कि एक मधुर, दर्दभरी और सुरीली तान पर बनाया है। यह महज़ चार दीवारें और एक छत नहीं, बल्कि ऐसा स्थान है जहाँ भोर से लेकर संध्या और संध्या से रात तक संगीत बहता है। यहाँ संवाद की स्वतंत्रता है, त्याग और समर्पण का अहसास है, और रिश्तों के मौन बंधन भी। इस घर में पंछियों की चहचहाहट, पेड़ों की हरियाली, तितलियों के रंग और मिट्टी की गंध बसी है। यहाँ प्राणवायु संचार करती है और नादब्रह्म विचरता है। यह रंगों और सुगंधों से भरा, मिट्टी और खुले आसमान से जुड़ा एक निरामय संसार है।

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सबके हृदय को भाया सावन

सावन का महीना आते ही प्रकृति खिल उठी है। बादल रिमझिम बरस रहे हैं और मोर अपने पंख फैलाकर नाच रहे हैं। बिजली की चमक आकाश को दमका देती है। बच्चे हर्षित हैं, क्योंकि सावन का मौसम लौट आया है। घर-घर में पूड़ी, कचौड़ी और पकोड़ी बन रही हैं, चटनी के साथ इनका स्वाद और बढ़ जाता है। झरनों पर सैर-सपाटा करने का आनंद है और सब मिलकर झूमते-नाचते हैं।
खेतों में फसलें लहराकर हरियाली फैला रही हैं, फूलों की बहार मन को मोह लेती है। नीम और बरगद पर झूले पड़ गए हैं, जिन पर बच्चे और बड़े सभी झूलते हुए खुशी से भर उठते हैं। मिट्टी की भीनी-भीनी महक और पक्षियों की मधुर चहचहाहट वातावरण को और सुहाना बना देती है। प्रकृति का यह रूप सचमुच मनभावन है और हर दिल को भा जाता है।

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