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फ़िरोज़ी मफ़लर

कल्पना मनोरमा, प्रसिद्ध साहित्यकार

सुनो!
नवंबर की पीली शामों में
तुम अकेले-अकेले
मत घूमने निकलो
इस महीने की धूप छलावा है—
तुम उसकी गुनगुनी ऊँगली पकड़
चलते रहोगे,
और वह अचानक दाँव देकर
भाग जाएगी
अपने प्रेमी के साथ
फिर तुम्हें रास्ता
खोजने से भी नहीं मिलेगा,
क्योंकि सूखे पत्तों के बीच
हमेशा ही गुम हो जाते हैं
हरे-भरे पत्ते
ठहरो… कहा तो था—
हम चलेंगे तुम्हारे साथ
बस, पिछले बरस का तुम्हारा
अधूरा फ़िरोज़ी मफलर
बुनाई के अंतिम मोड़ पर है
आओ,
करें सर्दियों की तैयारियाँ
मिलकर—
हम दोनों।

2 thoughts on “फ़िरोज़ी मफ़लर

  1. सुंदर रचना कल्पना जी। आप से मिलने की इच्छा और उम्मीद रखती हूं।

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