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चरैवेति का अर्थ

यूँ तो पृथ्वी की तरह हर मनुष्य पूरी ज़िन्दगी घूमता रहता है। घूमना उसके चलायमान जीवन की नियति होती है। पर आदिवासी कबीलों के पैर में ऐसी चक्की होती है कि वे आजीवन घूमते रहते हैं। उनकी धारणा है कि जीवन का अर्थ या मोक्ष ही है चलते रहना। यही जीवन को गति देती है, लय देती है। सच भी है, घुमंतूपन मनुष्य प्रजाति की एक सहज और स्वाभाविक गति है, जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है, प्रकृति से जोड़ती है, जीवन को संगीत से जोड़ती है।

शायद इसी लिए राहुल सांस्कृत्यायन ने लिखा — “अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा।” लोगों को समझाने की कोशिश की कि घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता, क्योंकि इससे जिज्ञासा पैदा होती है।

जिज्ञासा परम हितकारी होती है। सांस्कृत्यायन ने लिखा कि प्राकृतिक, आदिम मनुष्य परम घुमक्कड़ था। खेती, बाग़वानी तथा घर-द्वार से मुक्त, वह आकाश के पंछियों की भाँति पृथ्वी पर विचरण करता था। जाड़े में यदि इस जगह, तो गर्मियों में वहाँ से दो सौ कोस दूर। यदि हम घुमक्कड़ न होते तो हम कभी नहीं समझ सकते थे कि शिखरों का सौंदर्य कैसा है, देवदार के गहन वनों का रूप और उनकी गंध कैसी है।

कोलंबस और वास्को-दा-गामा दो ऐसे ही घुमक्कड़ थे जिन्होंने पश्चिमी देश को आगे बढ़ने का रास्ता खोला। हमारे यहाँ के अधिकांश धर्मनायक, जो आचार-विचार, तर्क और सहृदयता में सर्वश्रेष्ठ थे, घुमक्कड़ ही रहे। उन्हीं घुमक्कड़ श्रेष्ठ में एक-राज थे। यद्यपि वे भारत से बाहर नहीं गए, लेकिन वर्षों के तीन महीनों को छोड़कर वह एक जगह रहना पाप समझते थे।

वह स्वयं घुमक्कड़ नहीं थे, बल्कि अपने शिष्यों से भी उन्होंने कहा — “चरैवेति” जिसका अर्थ है — “भिक्षुओं! घुमक्कड़ी करो।” बौद्ध के भिक्षुओं ने तो जापान, मंगोलिया, मकदूनिया, बाली और बाँका तक का भ्रमण कर डाला, जिस पर हर भारतीयों को अभिमान है। केवल बुद्ध ने ही ऐसा नहीं किया, बल्कि बुद्ध से भी एक-दो शताब्दी पहले भी यह था। उस वक़्त पुरुष ही नहीं, स्त्रियाँ भी जम्बूरी-वृत्त की शाखा लेकर अपनी प्रखर प्रतिभा का विस्तार करतीं और पूरे भारत में घूमतीं।

घुमक्कड़ी धर्म में हम स्वामी दयानंद को कभी नहीं भुला सकते। उन्होंने भारत के अधिक भागों में भ्रमण किया, पुस्तकें लिखीं, शास्त्रार्थ किया। उन्होंने भ्रमण के विरुद्ध जितनी थोथी दलीलें दी जाती थीं, सबकी चिंदी-चिंदी उड़ा दी और समझाया कि मनुष्य स्थावर वृत्त नहीं है। वह जंगम प्राणी है। चलना मनुष्य का धर्म है। जिसने इसे छोड़ा, वह मनुष्य होने का अधिकारी नहीं है।

यहाँ मैं दो आधुनिक घुमक्कड़ों के नाम बताती हूँ। पहले हैं जयदीप। उत्तराखंड के प्रकाश पुरोहित जयदीप एक ऐसे घुमक्कड़ हैं जिन्होंने अपनी जान हथेली पर रखकर प्रकृति के मनोरम चित्रात्मक दृश्यों को काव्यमय भाषा में ढालकर सबको नई कल्पना का संसार और घुमक्कड़ी का रास्ता दिया। उत्तराखंड के लगभग सभी ट्रैकिंग रूट्स जयदीप ने अकेले या साथियों के साथ किए हैं और अपने आत्मीय, रोचक लेखन से यादगार आलेख, संस्मरण लिखे।

दूसरे प्रकाश पुरोहित हैं, जो पहाड़ों के प्रति अपने प्यार और पीड़ा को अपने काव्यमय लेखों में इस तरह वर्णित करते हैं, जैसे पाठक को उँगली पकड़ा कर वह एक अलग ही दुनिया में ले जा रहे हों—जहाँ न राग है न द्वेष, न कोलाहल है न निर्जीव चुप्पी। वहाँ है तो निश्छल प्रकृति का अनंत विस्तार।

यह तो है “अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा” से शुरू हुई हमारी यायावरी की एक रोचक कथा, जिसने हमें देश-दुनिया का इतिहास, भूगोल ही नहीं बताया, बल्कि समाज और संस्कृति के विभिन्न रूपों से भी परिचित कराया। हमारी जिज्ञासा को एक उड़ान दी।

तभी शायद हमारे पुरखों ने भी कहा है — “जो बैठा उसका नसीब बैठ जाता है।” इसलिए चलिए, हम भी चलते हैं कहीं—किसी ओर—अपनी जिज्ञासा उँगली थाम कर।

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