gulmohar

मुसलसल याद करते जा रहे हो तुम

ख़यालों और यादों में डूबे प्रेम को दर्शाती हिंदी ग़ज़ल कुछ रिश्ते ख़ामुशी में भी लगातार याद आते रहते हैं

शावर भकत ‘भवानी ‘

ख़यालों में मुसलसल आ रहे हो तुम,
मेरे अल्फ़ाज़ को महका रहे हो तुम।

धुआँ क्यों बारहा सुलगा रहे हो तुम,
निगाहों में मेरी मुस्का रहे हो तुम।

हकीक़त है यही मेरे ख़यालों से,
मेरे दिल में उतरते जा रहे हो तुम।

तुम्हारी ख़ामुशी पढ़ लेते हैं हम भी,
इशारों से किसे बहला रहे हो तुम।

मुझे फिर-फिर ख़यालों के ही रस्ते से,
मेरे ही माज़ी में ले जा रहे हो तुम।

न आया हाले दिल ज़ाहिर तुम्हें करना,
बताना क्या था क्या बतला रहे हो तुम।

कहे है शाम से ये हिचकियाँ मेरी,
मुसलसल याद करते जा रहे हो तुम।


ये रचनाएं भी पढ़िए-
रिश्तों की याद
मुसलसल याद करते जा रहे हो तुम
लुका-छुपी वाला प्रेम
कहाँ आसान है एक स्त्री का कर्ण हो जाना
लखनऊ में महादेवी वर्मा की पुण्य स्मृति में विश्वभूषण सम्मान समारोह संपन्न
ख़ामोश घर की दीवारें फुसफुसाती हैं

5 thoughts on “मुसलसल याद करते जा रहे हो तुम”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *