
शावर भकत ‘भवानी ‘
ख़यालों में मुसलसल आ रहे हो तुम,
मेरे अल्फ़ाज़ को महका रहे हो तुम।
धुआँ क्यों बारहा सुलगा रहे हो तुम,
निगाहों में मेरी मुस्का रहे हो तुम।
हकीक़त है यही मेरे ख़यालों से,
मेरे दिल में उतरते जा रहे हो तुम।
तुम्हारी ख़ामुशी पढ़ लेते हैं हम भी,
इशारों से किसे बहला रहे हो तुम।
मुझे फिर-फिर ख़यालों के ही रस्ते से,
मेरे ही माज़ी में ले जा रहे हो तुम।
न आया हाले दिल ज़ाहिर तुम्हें करना,
बताना क्या था क्या बतला रहे हो तुम।
कहे है शाम से ये हिचकियाँ मेरी,
मुसलसल याद करते जा रहे हो तुम।
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