रीता मिश्रा तिवारी की लंबी कहानी का पहला भाग

रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर
लोहे के गेट पर जंगली लताओं और जालों ने अपना साम्राज्य स्थापित कर रखा था। गोधूलि बेला में आकाश ने सूर्य की सिंदूरी किरणों की चादर ओढ़ रखी थी। मैंने भारी पीतल के ताले, जो देखने में अब लोहे के लग रहे थे, खोलकर भीतर आ गया।
धीरे-धीरे आकाश अपने सौम्य नीलवर्ण को त्यागकर श्यामवर्ण में तब्दील होता गया। मैं उसकी फितरत को अच्छी तरह समझ गया। मुस्कुराकर जंगली घास को लाँघता हुआ, एक डर के साथ बरामदे तक आ गया। झिंगुरों की आवाज़ और पत्तों की खड़खड़ाहट से वातावरण बेहद भयावह लग रहा था। मोबाइल की रोशनी में हौले-हौले चलता हुआ मैंने कमरे का दरवाज़ा खोला और अंदर प्रवेश किया।जबरदस्त स्वागत किया मेरा दरवाज़े और कमरे में फैले जालों ने।
फर्श की नमी और बंद दीवारों की सीलन की एक भभका-सी नाक में घुस गई।एक अजीब-सी गंध थी, जो हम पर हावी हो रही थी।पॉकेट से मोमबत्ती निकालकर जलाई और कोने में रखी टेबल पर रख दी।रोशनी होते ही रोशनदान को अपना आशियाना बनाए पक्षियों ने पंख फड़फड़ाते हुए चीं-चीं करके कहना शुरू कर दिया “रहम करो, मेरा घर मत उजाड़ो, मेरे बच्चों को कुछ मत करना।” उनकी व्याकुलता देखकर मेरे होठों पर मुस्कुराहट तैर गई। उन्हें आश्वासन देकर रात गुज़ारने लायक कमरे को ठीक किया मैंने। आधी रात गुज़र चुकी थी और कमरे की खामोशी को घड़ी की टिक-टिक तोड़ रही थी। कुछ समय पश्चात जैसे उसकी रफ्तार भी थककर धीमी पड़ गई।
सन्नाटे में लिपटी दीवारें अपने अकेलेपन, कल की यादों और आने वाले कल की उम्मीदों की गवाह बनकर हर कोने में बसी सुख-दुःख की खुशियाँ, आँसू और इस चारदीवारी में दबे हर राज़ बता रही थीं।बेरंग, सीलन भरी दीवारों पर धूल से सनी तस्वीरें और झरा हुआ प्लास्टर उन लम्हों की जीवंत दास्तान सुना रहे थे।दीवारों की फुसफुसाहट में मेरे दिल की धड़कन शामिल हो गई। आरामकुर्सी पर बैठे-बैठे जाने कब नींद ने अपने आगोश में ले लिया, पता ही नहीं चला।
