
‘स्वरा’ सुरेखा अग्रवाल
कभी देखा है किसी स्त्री को कर्ण होते..!!
कानों में कुंडल, जिस्म पर कवच धारण किए हुए..!
संवेदनाओं का लक्ष्य भेद, कुंडलों-सा सामाजिक विचारों को धारण करने की बातें। हाथों में मर्यादाओं की चूड़ियाँ, माथे पर भव्य सुर्ख लाल सौभाग्य की बड़ी-सी बिंदी, मानो सूर्य को अपने मस्तिष्क पर स्थापित किए हुए..!!
गहरी काली काजल से भरी दो नैना, जिसमें गर्भ के साथ ही दिखा दी जाती है मर्यादाओं की खाई…!
फिर यौवन की दहलीज में भर दी जाती है एक माँग, सर्वस्व के लिए…!!
एक स्त्री का कर्ण होना आसान नहीं होता..!!
अंगराज को अपना, अपने ही देह में करती है फिर वह सृजन अपने ही उत्तराधिकारी का। विस्तृत करती है साम्राज्य। उस स्थापना के लिए अक्सर लेती है एक नया जन्म, जघन्य पीड़ा के उपरांत। सुनो न.. स्त्री का कर्ण होना आसान नहीं..!!
आखेट रूपी जिंदगी को सींचती हैं, ख़ुद को ख़ुद के अस्तित्व से देती हुई कई अग्निपरीक्षाएँ..! उस सूत पुत्र की तरह जानती है, वे सशक्त हैं हर मायने में। फिर भी हार जाती है वे अपने प्रेम के ख़ातिर।
समर्पण और प्रेम के संतुलन में अक्सर जूझती है तरकश में कैद बाणों-सी वह। भेदना जानती है वह हर तरह का चक्रव्यूह।
लक्ष्य निर्धारण के साथ चल देती है, धारण किए मुनि-वेश, थामे मर्यादा का कमंडल…!!
अपने दूसरे प्रेम की लाज के लिए धारण कर लेती हैं एक अज्ञातवास। पता है क्यों? एक ज़िंदगी वह समाज के लिए जीती हैं और दूसरी उस प्रेम के ख़ातिर, जो स्वर्णमृग-सा होकर भी उसको अपने मोहपाश में बाँधे रहता है।
ज़िम्मेदारियों से फ़ारिग हो तब फिर भटकती है उस मृग को पाने, जो उसकी ज़िंदगी की पारी का वह कटु सत्य होता है।
पता है कैसे? अब वह कर्ण बदलने लगता है अपना स्वरूप। अपनेपन का मारा, नितांत अकेला बन जाता है वह। शायद कौन्तेय की लाज रखने, वह समाधिस्थ हो जाती है अपने परिधि से बाहर किए प्रेम के ख़ातिर, जो सदियों से अमान्य है, जो कहलाता है एक भटकाव और फिर बन अभिशप्त-सी अहिल्या…!!
वही कर्ण अपनी माता कुंती-सा सहज त्याग देता है उस मुनि-वेश धारण की हुई स्त्री को, जो सच की परछाईं से दूर भागता-सा, अस्तित्व-विहीन होते कर्ण को, एक स्त्री ही समझ सकती है। क्योंकि उस-सा ही वजूद जीती आई हैं हम स्त्रियाँ..!
तो बोलो, कहाँ आसान है एक स्त्री का कर्ण हो जाना..!
तभी तो अमर-अजर हो मरती है सदियों तक, लाल रक्तिम आँखों संग, जिसमें भयानक अंतर्नाद के साथ गूँजती है एक युद्ध-दुंदुभी। एक प्रहर से दूसरे प्रहर तक। एक उम्र से दूसरी उम्र की दहलीज़ तक।
समर्पित, किंतु मन में दूसरे प्रेम की चिता जलाए, जिसे वह ख़ुद मुखाग्नि दे, तोड़ देती है सदियों से चले आ रहे रिवाज़ों को, जो वर्जित हैं स्त्रियों के लिए।
सुनो, कभी सुना है कर्ण-सी बनी स्त्रियों को, जो ख़ुद की अंत्येष्टि के लिए छोड़ देती हैं दुनिया के कट्टर रस्मो-रिवाज़..?
दूसरा कर्ण कोई कहाँ बन पाया अब तक, तभी तो संभाल ली स्त्रियों ने उसके उत्तराधिकारी का अनाम सिंहासन।
तो बोलो, कहाँ आसान है स्त्रियों का भी कर्ण हो जाना…!!
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