कहाँ आसान है एक स्त्री का कर्ण हो जाना
एक स्त्री अपने जीवन में कितने कवच-कुंडल धारण करती है? प्रेम, जिम्मेदारियों, सामाजिक मर्यादाओं और अपने अस्तित्व के बीच संघर्ष करती स्त्री के अंतर्द्वंद्व को कर्ण के रूपक में प्रस्तुत करता संवेदनशील लेख.

एक स्त्री अपने जीवन में कितने कवच-कुंडल धारण करती है? प्रेम, जिम्मेदारियों, सामाजिक मर्यादाओं और अपने अस्तित्व के बीच संघर्ष करती स्त्री के अंतर्द्वंद्व को कर्ण के रूपक में प्रस्तुत करता संवेदनशील लेख.
“सावन जब अपने पूरे श्रृंगार में होता है, तब हर डाल झूमती है, हर कोना भीगता है — लेकिन एक बेटी के मन का कोना तब भी सूना रह जाता है जब वह बाबुल के आंगन से दूर होती है। अमराइयों की डालियाँ झूलों से भर जाती हैं, लेकिन उसकी आँखों में झूले पीहर की यादों के बनते हैं। मेघा की हर गर्जना में वह अपनी माँ की पुकार सुनती है, और हर रिमझिम बूँद में अपने बचपन की हँसी। सावन, जो बाकी दुनिया के लिए उल्लास है, एक बेटी के लिए कभी-कभी वेदना की धूप-छाँव भी बन जाता है।”
हर साल फरवरी में पलाश जब अनंत से उतरकर मेरे छत की मुंडेर तक खिल जाता था, तब कुछ भीतर गुनगुनाने लगता था। ज्वालामुखी से दहकते फूलों की गरमी मेरी उँगलियों तक दौड़ जाती थी। किताबें बेअसर हो जाती थीं, मन मुंडेर पर टिक जाता था, और अम्मा की डांट भी उस खींचाव को रोक नहीं पाती थी। तब नीले स्कर्ट की सुनहरी किनारी घुटनों तक फहराती थी और गालों पर सिंदूरी रंग अपनी पहली होली खेलने लगता था। साल दर साल फरवरी आती रही, लेकिन आज कपोल रक्तहीन हो गए, स्कर्ट बीते दिनों की बात बन गई, और अम्मा की डांट एक स्मृति। लेकिन मन अब भी चाहता है कि पलाश लौटे, फिर एक बार मुंडेर तक झुके, फिर से होरी से पहले होली खेली जाए।
वो शाम, वो शहर, वो गुलाब, वो चाय — सब कुछ जो मेरा था, किसी और का हो गया। मेरी हर पसंद, हर भावना, हर छुअन की कल्पना… कोई चुपचाप अपने साथ ले गया। यह कविता नहीं, मेरी बिखरी हुई ज़िंदगी की दास्तान है।
रात की निस्तब्धता में प्रेम का प्रश्न भीतर गूंज रहा था। संगीत की सधी स्वर लहरियाँ मन को ऐसे छू गईं कि सब तर्क-वितर्क, प्रश्न-उत्तर उस तकिए पर ढुलकी एक बूंद में विलीन हो गए… जैसे प्रेम समझाने का नहीं, केवल महसूस करने का विषय हो।
यह कविता उन पुरानी प्रेमिकाओं और पत्नियों को समर्पित है जिन्हें पढ़ना-लिखना भले न आता हो, पर जिन्होंने प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्तियाँ रचीं — कभी गीली मिट्टी में पैर के अंगूठे से प्रेम-पत्र उकेरकर, तो कभी पलकों के इशारे से मन की बात कहकर। उनका प्रेम किताबों में नहीं, ज़मीन पर लिखा जाता था। आज की चिकनी टाइल्स और मार्बल की ज़मीन पर वो प्रेम-पत्र कहीं दबकर खो चुके हैं। इस निश्छल, मौन, पर गहरे प्रेम को समझने के लिए शायद हमें टाइम मशीन में लौटकर जाना होगा।
इस कविता में एक स्त्री अपने जीवन के उस मोड़ पर खड़ी होकर गुज़रे समय को फिर से जीने की ख्वाहिश करती है — वो अधूरे सपने, वो रिश्ते, वो बचपन की अलमारी, और माँ की बातें… सब कुछ एक बार फिर सहेजने की उम्मीद लिए। यह एक आत्ममंथन है, एक नई शुरुआत की ओर बढ़ने का भावुक आह्वान।”