रात अभी पूरी तरह डूबी नहीं थी… अपनी गहराई में उतरने से पहले जैसे कुछ देर ठिठक कर खड़ी थी।
मैं बिस्तर पर पड़ी-पड़ी अचानक उठी, और खिड़की से बाहर झाँकने लगी।
आँखों की पुतलियाँ रुपहली टिकुली से चमकते चाँद पर ठहर गईं।
चारों ओर निस्तब्धता थी… पर भीतर प्रश्नों का कोलाहल सब कुछ अस्त-व्यस्त कर रहा था।
पलकों को ज़ोर से भींच कर इन विचारों को छलने की असफल कोशिश की…
आख़िरकार हार मान ली।
अब बस रात्रि के अंतिम प्रहर तक
झींगुरों की रागिनी,
रातरानी की महक,
बेली की धीमी सरगोशी
और करवटों की सलवटें…
वैसे तो रात्रि की यह निस्तब्धता मुझे बहुत प्रिय है,
पर शरीर का समय-चक्र इसकी अनुमति नहीं दे रहा…
“प्रेम क्या है?”
इस प्रश्न के अनगिनत उत्तर हैं।
तर्क हैं, कुतर्क हैं, इतने कि इनसे महाग्रंथों की श्रृंखला रची जा सकती है।
परंतु संदर्भ के अनुसार ये प्रश्न और उत्तर बार-बार अपनी भूमिका बदलते रहते हैं।
बहुत शोर है… इतना कि अब यह पीड़ादायक हो चला है।
कुछ सुनने को जी चाहा… शायद कोई संगीत, जो इस शोर से मुझे बाहर निकाल सके।
मोबाइल उठाया ही था कि व्हाट्सएप पर एक लिंक आ गया।
दिन भर की उदासी जैसे एक पल में सिमटकर होंठों पर मुस्कान बन गई।
ईयरफोन लगाया, आँखें मूँद लीं।
धीरे-धीरे स्वर स्पष्ट हुआ…
भाव मन में घुलने लगे…
एक अनकही थकान…
अथाह जलराशि के मध्य एक अतृप्त तृष्णा…
स्वर इतना सधा, इतना संतुलित… कि वो सीधे भीतर उतरता गया।
एक बार नहीं, कई बार…
हर बार भाव और भी गहराते गए…
मैं एक हो गई उस रचना से।
चाँद, रात, खिड़की सब धुँधलाने लगे…
पार्श्व की सारी ध्वनियाँ शून्य हो गईं।
बंद पलकों के कोरों से कुछ बूँदें ढुलक कर तकिए पर गिर पड़ीं…
और एक बिंदु बनकर थम गईं।
मैं आश्चर्यचकित कुछ देर तक उस बिंदु को देखती रही…
और महसूस किया —
प्रेम जैसे अनंत, अथाह विषय के
सारे तर्क, सारे प्रश्न
उस एक क्षुद्र बिंदु पर
विलीन हो चुके थे।

सुनीता सिंह, कवयित्री, कोलकाता

बोहोत ही सुंदर
प्रेम गली अति सांकरी
जामे दो ना समाय