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आसमान की ओर देखते हुए आत्मचिंतन में डूबा एक युवा, जो अपनी पहचान और जीवन के उद्देश्य की तलाश कर रहा है।

मैं कौन हूँ ?

“मैं कौन हूँ?”—यह सिर्फ़ तीन शब्दों का सवाल नहीं, बल्कि पूरी ज़िंदगी का सफ़र है। यह लेख एक युवा की आत्मखोज, संघर्ष, बदलाव, आत्मविश्वास और सपनों की कहानी है, जो बताती है कि इंसान की असली पहचान उसके निरंतर सीखने और बदलने की प्रक्रिया में छिपी होती है।

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उफनते सागर के किनारे खड़ा एक चिंतनशील व्यक्ति अपनी परछाई को निहारता हुआ, समय, अस्तित्व और जीवन के बदलते किरदारों पर मनन करता हुआ।

किरदार

हम सभी अपने भीतर कई किरदारों को जीते हैं। कुछ समय के साथ खो जाते हैं, कुछ स्मृतियों में रह जाते हैं, और कुछ जीवन के संघर्षों के बीच नई पहचान गढ़ते हैं। ‘किरदार’ जीवन, समय, जिजीविषा और आत्म-अस्तित्व की उसी अंतर्द्वंद्वपूर्ण यात्रा का काव्यात्मक दस्तावेज़ है।

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दो रास्तों के बीच खड़ा एक चिंतनशील व्यक्ति, इच्छा और ईश्वर की इच्छा के बीच आंतरिक संघर्ष को दर्शाता आध्यात्मिक दृश्य।

इच्छा और ईश्वर का संघर्ष

इच्छा और ईश्वर का संघर्ष’ एक गहन आध्यात्मिक लेख है, जो मनुष्य की अनंत इच्छाओं, ईश्वर की व्यवस्था और समर्पण के भाव के बीच के सूक्ष्म संबंध को समझाने का प्रयास करता है। यह लेख बताता है कि हर अधूरी इच्छा केवल अभाव नहीं, कई बार जागरण का मार्ग भी होती है।

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आत्मचिंतन और करुणा के भावों से भरी एक भारतीय महिला की प्रतीकात्मक छवि, जो सृजन और संवेदना का संदेश दे रही है।

जननी से जगजननी तक

आज के परिवेश में कुछ नारियाँ भी भयावह कांड करने वाली हो गई हैं। विविध अशोभनीय, असंवेदनशील और निर्दयी घटनाओं को देखकर हृदय द्रवित हो उठता है। पर ऐसा होने के पीछे दशकों से नारी पर किए गए अत्याचारों का परिणाम भी कहा जा सकता है, जिसके कारण वह असहनशील और संवेदनाहीन होकर जघन्य अपराध कर रही हैं। पर संभलना तो होगा उन नारी रूपों को, जो ऐसे कृत्य कर रही हैं।

क्योंकि, हे नारी! तू ही तो सृष्टि की आधारशिला है। यदि तू ही अपने जन्मे बच्चों को खा जाएगी, तो यह सृष्टि आगे कैसे बढ़ेगी? सृष्टि ही समाप्त हो जाएगी, क्योंकि तू ही तो जननहारी है। इन्हीं भावों को निम्न कविता में समेटने का प्रयास किया है नारी को चैतन्य करने के लिए….

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एक व्यक्ति ध्यान में बैठा हुआ, अंधकार से प्रकाश की ओर बदलता वातावरण, आत्मचिंतन का प्रतीक

मंथन

“मंथन” एक गहन और विचारोत्तेजक हिंदी कविता है, जो वर्तमान समाज की विसंगतियों और मानवता के गिरते मूल्यों पर गंभीर प्रश्न उठाती है। यह कविता केवल समस्याओं को उजागर नहीं करती, बल्कि आत्मचिंतन और सुधार की दिशा में एक सशक्त संदेश भी देती है।

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सूर्योदय के समय जीवन-यात्रा का प्रतीक एक राहगीर और प्राचीन सराय का दृश्य

‘नाटक’

यह दार्शनिक कविता जीवन को एक सराय और सुख-दुख को एक नाटक के रूप में प्रस्तुत करती है। ‘मैं’ और अहंकार के मंथन के बीच यह रचना कर्म, परिवर्तन और प्रेम की त्रिवेणी का संदेश देती है। जीवन की क्षणभंगुरता और आत्मबोध की रोशनी को उजागर करती यह कविता पाठक को भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती है।

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खिड़की के पास बैठा लेखक, वैचारिक लेखन में डूबा हुआ दृश्य

ज्ञान नहीं, बदलाव लिखिए

लेखन का उद्देश्य केवल ज्ञान बाँटना नहीं, बल्कि स्वयं से शुरू होने वाला परिवर्तन होना चाहिए। जब लेखन आत्मचिंतन बनता है, तभी वह समाज को दिशा देता है।

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सागर से संवाद: संघर्ष, धैर्य और नई शुरुआत की प्रेरक कविता

सागर तुम्हीं दिखाओ कोई रास्ता…

लहरों, तूफ़ानों और गहराइयों के माध्यम से सागर से संवाद करती यह कविता जीवन के संघर्ष, धैर्य और हर हार के बाद नई शुरुआत का साहस देती है।

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सकारात्मक सोच और आत्मचिंतन को दर्शाता प्रेरणादायक हिंदी लेख

परिस्थितियों को दोष देना छोड़ दें…!

परिस्थितियाँ हमारे जीवन की दिशा तय नहीं करतीं, बल्कि हमारी सोच उन्हें अर्थ देती है। एक ही स्थिति में कोई टूट जाता है और कोई निखर जाता है अंतर केवल मानसिकता का होता है। जब मन में विश्वास होता है, तब कठिन रास्ते भी सहज हो जाते हैं। जीवन को बदलने के लिए पहले दृष्टिकोण को बदलना आवश्यक है।

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