मंथन

एक व्यक्ति ध्यान में बैठा हुआ, अंधकार से प्रकाश की ओर बदलता वातावरण, आत्मचिंतन का प्रतीक "बदलाव की शुरुआत बाहर नहीं, भीतर के मंथन से होती है।"

मनीषा पटेल, मनु, प्रसिद्ध लेखिका, रायपुर (छत्तीसगढ़)

युग आया है कलुषित वृत्ति का, विश्वासघात का, दुराचारों का,
करना है मानवता का नवनिर्माण करना होगा आचरण का मंथन।

चरम पर हैं घृणित कार्य और अत्याचार, आतंक की पराकाष्ठा हुई,
चाहते हैं संतुलन सभ्यता का यदि करना होगा व्यवहारों का मंथन।

विषाक्त हुआ है जीवन-सागर, कटुता, ईर्ष्या और स्वार्थयुक्त स्वभाव से,
पाने को जीवन-अमृत और निर्मल मन करना होगा विचारों का मंथन।

सामाजिक रहा है युगों से मानव, पर अब अखरते उसे सामाजिक बंधन,
यह मोहभंग क्यों है? चाहते हैं जानना करना होगा उन कारणों का मंथन।

क्यों हो आवश्यकता समाज-सुधारकों की, जो समझ लें हम निज कर्तव्यों को,
सभ्यता की रक्षा हेतु जरूरी है आत्मचिंतन करना होगा आत्मा का मंथन।

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2 thoughts on “मंथन

  1. समसामयिक समस्याओं पर बेहतरीन कविता 💐💐

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