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दूब-धान

मायके से विदा होती भावुक महिला, माँ की याद में डूबी

मायके, माँ और बिछड़ते रिश्तों की मार्मिक कहानी

डॉ. रत्ना मानिक, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

गाड़ी पूरी रफ़्तार से शोर मचाती, दौड़ती, हांफती भागी जा रही थी, लेकिन मैं और मेरा दिल मारे घबराहट के बैठे जा रहे थे। मेरी स्थिति बिल्कुल वैसी थी जैसे किसी नटखट बच्चे की शैतानी पर कोई पड़ोसी उसका हाथ पकड़कर उसे उसके माता-पिता के पास शिकायत करने ले जा रहा हो, और बच्चा पूरी ताकत से पीछे की ओर खींचकर वहां से भाग जाना चाहता हो।

हाँ! मैं भी भाग जाना चाहती थी… नहीं जाना चाहती थी वहाँ… जहाँ… माँ…! पर पिता का ख्याल आते ही मेरा न जाने का निर्णय कमज़ोर पड़ने लगता था।

पिता का दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होता शरीर, धुंधली नज़रें, कांपते पैर, आए दिन उनकी तबीयत खराब होने की खबरें और आवाज़ की गहरी उदासी ने मुझे वहाँ जाने के लिए मजबूर कर दिया। इसी से माँ के जाने के कई साल बाद मैं यानी मनस्वी आज दुर्गा पूजा की छुट्टियों में अपने मायके जा रही थी… सिर्फ़… और सिर्फ़ अपने पिता के लिए। एक बार जी भरकर उन्हें देख लेने के लिए… कुछ दिन के लिए ही सही, उनकी धुंधली आँखों से बरसती वात्सल्य की नन्हीं किरणों की हल्की-हल्की गर्माहट को अपने आसपास महसूस करने के लिए।

घर करीब आता जा रहा था और मेरा दिल उछल-उछलकर हलक में अटक रहा था। कैसे… कैसे सामना करूँगी उस घर का, जहाँ माँ…!

एक झटके के साथ टैक्सी घर के सामने रुक गई। मैं सब्र का दामन थामे किसी तरह आगे बढ़ी। मुझे देखते ही पिता के उदास चेहरे पर पितृवत मुस्कान तैर गई।

“आ गई मनु…! कोई दिक्कत तो नहीं हुई? सिरदर्द तो नहीं हुआ न?”
पैर छूते ही पापा ने सिर पर आशीर्वाद भरा हाथ फेरते हुए पूछा। वे जानते थे कि उनकी बिटिया यात्रा की असुविधाओं, थकान और जहाँ-तहाँ पसरी गंदगी को बर्दाश्त नहीं कर पाती।

“अरे मनु! आ गई? भई… बड़ा इंतज़ार करवाया। बच्चे तो ‘बुआ-बुआ’ करते सो गए। चलो, फ्रेश हो जाओ, मैं खाना लगा देती हूँ।”
भाभी ने आती हुई उबासी को हथेली से ढकते हुए आधी नींद में कहा।

“जाओ बेटा! हाथ-मुँह धोकर खाना खा लो। दिन भर की थकी हो, आराम करो।”

पर मैं वहीं माँ के तख्त पर बैठी रही, जिस पर लेटे हुए उन्होंने ब्रेन ट्यूमर की असहनीय पीड़ा के कई साल कराहते हुए गुजारे थे। सहसा मुझे माँ का बाईं तरफ़ का स्याह पड़ गया पैर और भौहों के ऊपर उभर आया आलू-सा गहरा चोट का निशान याद आ गया, जब वे बेसुध होकर तख्त से गिर पड़ी थीं। मन अंदर तक कलप उठा… गले से लेकर कलेजे तक जैसे कोई नुकीली चीज़ चुभने लगी… इतनी असहनीय पीड़ा… माँ तो अपना वह कष्ट कहकर व्यक्त भी नहीं कर पाती थीं… ईश्वर ने उनकी आवाज़ जो छीन ली थी।

उनकी मटमैली आँखें अपनी असहनीय पीड़ा से हमेशा उनींदी-सी लगतीं, जिनमें उभरी लाल डोरियाँ उनकी वेदना की मौन गवाही देती थीं।मैं एक हाथ से तख्त के उस सिरे को सहला रही थी, जिधर माँ के पाँव हुआ करते थे, जैसे उन्हें प्रणाम कर अपने आने का एहसास करा रही हूँ। “मनु! खाना परोस दिया है, आ जाओ।”
भाभी की आवाज़ फिर कानों से टकराई, तो मेरा हाथ हल्के से काँप उठा। मन भारी होता जा रहा था। आँखों से निकली अश्रु-लड़ियाँ तख्त को चूम गईं।

नवरात्रि का नौवाँ दिन था और दशमी को मुझे यहाँ से निकलना था। पापा के कहने पर हम सभी रात को माता रानी के दर्शन करने निकल पड़े। वैसे भी मैं अपने यहाँ की नवरात्रि को बहुत मिस कर रही थी।

दूसरे दिन मुझे सड़क मार्ग से निकलना था। माता रानी के विसर्जन के बाद जिस तरह परिवेश में एक सूनापन पसर जाता है, मायके छोड़कर जाने के नाम पर मेरे हृदय में भी उसी तरह का सूना डेरा था।

मैं निकलने के लिए तैयार थी। पिता का सामना करना कठिन हो रहा था। घर के मंदिर में जाकर ईश्वर को प्रणाम कर मैंने शीश झुका दिया। मेरे भीतर का मौन, होठों में दबी सिसकी, माँ से अब कभी गले न लग पाने की असह्य वेदना सब कुछ ईश्वर को प्रेषित हो रहा था।

मेरी नज़रें अब भी कुछ तलाश रही थीं… मेरा मानसिक चैनल फिर घूम गया… मुझे विदा करते समय माँ का अपने आँचल की कोर से मेरी आँखें पोंछना और मेरे खोईछे में दूब-धान डालते हुए ठीक से रहने, अच्छे से खाने की नसीहतें देना याद आने लगा।

मैंने सवालिया निगाहों से पिता की ओर देखा।

“वो… वो क्या है न कि तुम… तुम लोग देर रात तक पंडाल घूमती रहीं न! तो… तो तुम्हारी भाभी की नींद अभी नहीं…”
पिता किसी अपराधी की भाँति नज़रें चुराते हुए दबी ज़ुबान में मेरी निगाहों का उत्तर दे रहे थे।

मैंने अंतिम बार पीछे मुड़कर हॉल के एक किनारे पड़े माँ के सूने तख्त को, वीरान दीवारों को और अपने खाली आँचल को देखा… जिसमें माँ के दुलार और मेरी मंगल कामना के न तो दूब-धान थे और न ही “फिर कब आओगी मनु…?” जैसे प्रश्न की व्यग्रता।

मैं झट से टैक्सी में बैठ गई। ड्राइवर, जो एक बुज़ुर्ग व्यक्ति थे, उनसे तुरंत चलने का निवेदन किया और मुँह में दुपट्टे का कोना ठूँसकर बुरी तरह फफक पड़ी।

रास्ते में माँ की कई प्रतिमाएँ मिलीं… जगत-जननी को विदा किया जा रहा था। उनके आँचल में भी तो खोईछा देने की परंपरा है… किंतु मेरा खोईछा…! मेरी मंगल कामना का दूब-धान… वह कहाँ था…?

लेखिका के बारे में-

डॉ. रत्ना मानिक
एक समर्पित शिक्षिका, संवेदनशील लेखिका और साहित्य की गहराइयों को समझने वाली विदुषी हैं।
स्वतंत्रता सेनानी परिवार से जुड़ी उनकी जड़ें उन्हें संस्कार और संघर्ष की प्रेरणा देती हैं। लोयोला बी.एड. कॉलेज से शिक्षण प्रशिक्षण प्राप्त कर उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में मजबूत आधार बनाया। कोल्हान विश्वविद्यालय से पीएच.डी. कर उन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी विद्वता को प्रमाणित किया। 2001 से हिंदी शिक्षिका के रूप में निरंतर विद्यार्थियों को ज्ञान और संस्कार प्रदान कर रही हैं। विभागाध्यक्ष और बोर्ड परीक्षाओं में हेड एग्जामिनर के रूप में उनकी जिम्मेदारी और दक्षता स्पष्ट झलकती है। लेखन की दुनिया में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाते हुए ‘आंखों के जुगनू’ जैसे कहानी संग्रह को प्रकाशित कराया। देशभर की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में उनकी रचनाएं नियमित प्रकाशित होती रही हैं। उनकी लेखनी में संवेदना, समाज और जीवन की सच्चाइयों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। डॉ. रत्ना मानिक शिक्षा और साहित्य—दोनों क्षेत्रों में निरंतर प्रेरणा की एक उज्ज्वल मिसाल हैं।

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