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जल रागिनी

समुद्र पर पड़ती सूर्य किरणों का सुंदर दृश्य

निरुपमासिंह ढाका, प्रसिद्ध लेखिका, बिजनौर

समुद्र के अंतःकरण पर
इतराती, इठलाती, मचलती
ये सूर्य-किरणें सप्त सुरों में
गाती हैं राग-रागिनी।

ये अनेकों मधुरिमाएँ-सी,
नृत्य करती नवयौवनाओं-सी
प्रतीत होती हैं, मानो
सागर से मिलना ही नियति हो।

सात सुरों की झंकार-सी
भर देतीं समुद्र-हृदय में
अपनी मधुर लहरियाँ,
बन साम्राज्ञी-सी।

सागर की सतह पर
जमाती अपना आधिपत्य,
तनिक भी संकोच नहीं करतीं।

सूर्य-किरणें नित नई
ताल पर थिरकतीं,
मानो कह रही हों
जीवन हमीं से तो है।।

5 thoughts on “जल रागिनी

  1. बहुत आभार आपका सुरेश जी, मेरी कविता को स्थान देने के लिए।🙏🏻🌺

  2. प्रभात काल में जब समुद्र पूरी कामनाओं के साथ मचल रहा होता है उस पर पड़ती भास्कर की स्वर्णिम रश्मियों की छवि उपस्थित करती एक सुंदर मनोहरी कविता

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