समुद्र पर पड़ती सूर्य किरणों का सुंदर दृश्य

जल रागिनी

“जल रागिनी” एक सुंदर प्रकृति कविता हिंदी में लिखी गई रचना है, जिसमें सूर्य किरणें और सागर के अद्भुत संगम को संगीतात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह जल रागिनी कविता प्रकृति के उस जीवंत क्षण को दर्शाती है, जब सूर्य की किरणें समुद्र की सतह पर थिरकती हुई जीवन, ऊर्जा और सौंदर्य का संदेश देती हैं। इस प्रकृति कविता में सागर और प्रकाश के मिलन को मानो एक दिव्य नृत्य के रूप में चित्रित किया गया है, जो पाठक को शांति, आनंद और आंतरिक अनुभूति से भर देता है।

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सागर से संवाद: संघर्ष, धैर्य और नई शुरुआत की प्रेरक कविता

सागर तुम्हीं दिखाओ कोई रास्ता…

लहरों, तूफ़ानों और गहराइयों के माध्यम से सागर से संवाद करती यह कविता जीवन के संघर्ष, धैर्य और हर हार के बाद नई शुरुआत का साहस देती है।

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मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम

श्रीराम को केवल एक राजा या नायक के रूप में नहीं, बल्कि आदर्श और जीवन-दर्शन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जिनमें मन रमा रहे, जिन्हें हमने कभी गुना नहीं, जो समय के शिलालेख पर पावन धाम हैं — वही राम हैं। उनकी मर्यादित कर्त्तव्य-बोध और कूटनीति की सूक्ष्म समझ, जीवन के रण में उनकी जीत और हार, सागर पर उनका साहस, प्रेम और त्याग — सब उन्हें न केवल नायक बल्कि नयनाभिराम बनाते हैं। उनके कार्य और आचरण हमारे जीवन में संजीवनी और अनमोल निधि की तरह हैं।

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प्रेम में पहाड़ होना

प्रेम केवल सहज अनुभव नहीं, बल्कि वह पहाड़ की तरह दृढ़ और विशाल भी हो सकता है। यह मन की गहराई से उत्पन्न होता है, तब जब शब्द भी लवों पर आने में संकोच करते हैं। प्रेम में केवल नदी या सागर की तरंगें नहीं, बल्कि वह इतनी शक्ति रखता है कि व्यक्ति पहाड़ बन जाए। यह केवल प्रेमी और प्रेमिका का रिश्ता नहीं है, बल्कि वह पीड़ा को भी अपने साथ बहा ले जाता है, सूर्य के ताप, चाँद की शीतलता, ऋषियों की तपस्या और हवन की अग्नि की तरह विस्तृत और बलिदानी होता है। प्रेम, त्याग और शिव के तांडव की भांति, कभी शांत, कभी उग्र — लेकिन हमेशा अमर और अडिग है।

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तन भादों, मन सावन

प्रेम में भीगकर तन-मन तरबतर हो जाता है। प्रिय की पनीली निगाहें जब देखती हैं तो भीतर जल-प्लावन-सा उमड़ पड़ता है। बहकी-बहकी हवाएँ चलती हैं तो तन और मन दोनों ही भाव-विभोर हो जाते हैं। मिलन और बिछोह का अनुभव मानो झूलों के आवागमन जैसा प्रतीत होता है। प्रिय के बदन को छूकर गुजरती हवाओं में सागर-सा लावण्य घुल जाता है। जब से वह मन के द्वार पर आया है, तन-मन उसका घर-आँगन बन गया है। अंतरतम में उसके बस जाने से तन मंदिर और मन पावन हो गया है।

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