
संध्या दीक्षित, प्रसिद्ध कवयित्री,
“राम रामेति रामेति,
रमे रामे मनोरमे”
जिनमें मन रमा रहे,
वही राम हैं,
नयनाभिराम हैं।
जिन्हें हमने गुना नहीं,
वही राम हैं,
नयनाभिराम हैं।
समय के शिलालेख पर
पावन धाम हैं,
वही राम हैं,
नयनाभिराम हैं।
मर्यादित कर्त्तव्य, कूटनीति की
जो क्षीण-सी सीमा रेखा है,
वही राम हैं,
नयनाभिराम हैं।
जीवन के रण में
जो सहर्ष हारते कभी,
जीतते सभी,
वही राम हैं,
नयनाभिराम हैं।
सागर पर जो शत्रु संधान
करते कभी,
जीतते सभी,
वही राम हैं,
नयनाभिराम हैं।
खाते जो प्रेम से
झूठे बेर शबरी के,
वही राम हैं,
नयनाभिराम हैं।
वह जो फटकारते
गौतम को,
जीवन मंत्र देते
अहिल्या को,
वही राम हैं,
नयनाभिराम हैं।
अनमोल निधि हैं
हमारे जीवन की,
संजीवनी हैं
हमारे तन-मन की,
वही राम हैं,
नयनाभिराम हैं।
वही राम हैं,
नयनाभिराम हैं।
