
अंशु जैन, प्रसिद्ध लेखिका, देहरादून
पुस्तक के पन्नों में दबा हुआ सूखा गुलाब,
आज भी करता है वह मूक संवाद,
जो शब्द कभी कह न सके।
नर्म पंखुड़ियाँ झर गईं,
पर उनकी खामोशी में है वह गीत,
जो मेरे मन को छू गया था,
पर होंठों ने कभी गुनगुनाया नहीं।
सूखे गुलाब की हर सिलवट में छिपा है
एक अनकहे मूक संवाद का एहसास।
उसके सुर्ख रंग में बसी है
उस शाम की लालिमा, जब दिलों ने इकरार किया था।
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पुस्तक से निकालते समय,
क्या तुमने सुनी है उसकी सरसराहट?
वह कहता है
मुझे भले ही समय ने सुखा दिया,
पर मेरे प्यार की तासीर अब भी बाकी है।

धन्यवाद 🙏🌹🙏
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