52 वर्षीय ऑटो चालक की दर्दनाक कहानी

प्रियांशी वंजारी, मीडियाकर्मी, पुणे
मुंबई जैसे भागदौड़ भरे शहर में हर कोई अपनी किस्मत आजमाने और अपने परिवार का पेट पालने आता है. लेकिन जब रोजी-रोटी की लड़ाई में नियम और नीतियां आड़े आ जाएं, तो एक आम इंसान का जीवन किस कदर बिखर जाता है, इसकी बानगी शहर की सड़कों पर देखने को मिली.
यह कहानी है 52 वर्षीय रामचरण की—एक ऐसा ऑटो चालक जिसने अपनी जिंदगी के 30 साल इसी शहर की सड़कों पर बिता दिए. लेकिन आज उसकी ईमानदारी और सालों की मेहनत एक नई शर्त के आगे पस्त हो गई है.
सरकारी आदेश के तहत रामचरण जैसे चालकों के लिए भाषा सीखना अनिवार्य कर दिया गया. 52-55 साल की उम्र में, जब हाथ कांपने लगते हैं और आंखें कमजोर होने लगती हैं, रामचरण हर शाम ऑटो खड़ा करके ‘भाषा की क्लास’ में बैठने लगा.
रामचरण का कहना है, “50 से ज्यादा की उम्र में अब मेरी जुबान नई भाषा के शब्द पकड़ नहीं पाती. क्लास में जब सर पढ़ाते हैं, तो मेरे दिमाग में शब्दों की जगह घर का हिसाब घूमता है—बूढ़ी मां की बीपी की दवाई, रसोई का खत्म होता राशन और बेटी की फीस. तीन घंटे क्लास में बैठने का मतलब है 400 रुपये की दिहाड़ी का नुकसान.”
झोपड़पट्टी में रहने वाले रामचरण के घर में चूल्हा तभी जलता है, जब वह दिनभर स्टीयरिंग संभालता है. क्लास में बिताया हर घंटा उसके परिवार के निवाले पर भारी पड़ रहा था.
रोज शाम जब वह खाली हाथ घर लौटता, तो उसकी बूढ़ी मां और परिवार आस लगाए बैठे होते. रामचरण खुद से यही सवाल पूछता रहा कि क्या 30 साल तक इस शहर के लोगों को सुरक्षा के साथ उनकी मंजिल तक पहुंचाने की कोई कीमत नहीं?
“30 साल में मैंने कभी किसी सवारी से उसकी जात या भाषा नहीं पूछी. फिर आज मेरी रोजी-रोटी को भाषा की कसौटी पर क्यों नापा जा रहा है?” यह सवाल सिर्फ रामचरण का नहीं, बल्कि उसके जैसे कई बुजुर्ग चालकों का है, जो इस ढलती उम्र में नई पढ़ाई का बोझ नहीं उठा पा रहे.
कहानी का सबसे दर्दनाक मोड़ तब आया, जब कम समय में भाषा न सीख पाने और परीक्षा में विफल रहने के कारण रामचरण पर भारी जुर्माना लगा दिया गया. इतना ही नहीं, उसका ऑटो चलाने का लाइसेंस भी रद्द कर दिया गया.
जिस ऑटो के जरिए वह अपने बुजुर्ग माता-पिता की दवाइयां और परिवार का राशन लाता था, वह अब एक जगह खड़ा है.
अपनी आपबीती बताते हुए रामचरण की आंखों में आंसू आ गए: “अरे साहब, भाषा तो इंसानियत और दिल की होती है. जब मेरे बूढ़े मां-बाप को भूख लगती है, तो उनकी भूख की कोई भाषा नहीं होती. आज मेरा ऑटो छीन लिया गया, मेरी रोजी-रोटी छीन ली गई… सिर्फ इसलिए कि मैं इस उम्र में एक नई भाषा के अक्षर नहीं जोड़ पाया.”
रामचरण की यह आपबीती आज शहर के प्रशासनिक नियमों और आम आदमी की जमीनी हकीकत के बीच के बड़े अंतर को उजागर करती है.
सुरक्षा और नियमों का पालन अपनी जगह है, लेकिन क्या किसी 55 साल के बुजुर्ग से, जो अपने परिवार का इकलौता कमाने वाला है, रातों-रात सब कुछ सीख लेने की उम्मीद करना सही है? क्या नियमों को लागू करते समय उन गरीबों की दिहाड़ी और पेट की भूख का ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए?
यह मामला सिर्फ एक लाइसेंस रद्द होने का नहीं है, बल्कि उस इंसानियत का है, जो कागजी नियमों के नीचे कहीं दबकर रह गई है.
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