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खामोश गुलमोहर, महकती रजनीगंधा 

गुलमोहर और रजनीगंधा के माध्यम से अनकहे प्रेम को दर्शाती हिंदी कविता गुलमोहर और रजनीगंधा,

सुरेश परिहार, पुणे

उस रात
मौसम बड़ा सुहाना था।

गुलमोहर
दूर किसी बालकनी में
रजनीगंधा को देर तक निहारता रहा
चुपचाप,
फिर अचानक
तेज़ हवाएँ चलीं।

गुलमोहर के लाल-सुर्ख फूल
टूटकर ज़मीन पर बिखरने लगे,
शाखाएँ
एक-एक कर
उसका साथ छोड़ने लगीं।

रजनीगंधा
चुप रही,
मगर उसकी खुशबू में
एक बेचैनी उतर आई।

रात किसी तरह बीत गई।

सुबह
गुलमोहर बहुत चुप था
बहुत चुप।

रजनीगंधा ने भी
अपनी खुशबू
जैसे रोक ली थी।

शाम को बारिश हुई।

गुलमोहर
भीगा हुआ खड़ा था
टूटा हुआ,
मगर ज़िंदा।

रजनीगंधा उसे
देर तक देखती रही…

और उस रात
वह कुछ ज़्यादा महकी।

न गुलमोहर कुछ कह पाया,
न रजनीगंधा कुछ बोल सकी

बस,
एक ने फूलों से कहा,
दूसरी ने खुशबू से जवाब दे दिया।

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