ये कहाँ आ गए हम…

दूरी में खड़े एक जोड़े का भावुक दृश्य, जो अनकहे रिश्ते और गहरी भावनाओं को दर्शाता है "कुछ रिश्तों को नाम नहीं दिया जाता, सिर्फ महसूस किया जाता है..

विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद

ये कहाँ आ गए हम,
यूँ ही साथ चलते-चलते…

चल तो रहे हैं हमसफर बनकर,
कि साथ है भी या नहीं…

या ये महज़ आदत है,
कि हम एक-दूसरे की आवाज़
सुने बगैर रह नहीं सकते,
कि हम एक-दूसरे से लड़े बगैर
हँस नहीं सकते,
कि हम एक-दूसरे की फ़िक्र किए बगैर
जी नहीं सकते…

बड़ा ही अद्भुत
और अजब-ग़ज़ब रिश्ता है हमारा,
कि एक पल की दूरी सही नहीं जाती,
और दूर हैं इतने
कि नज़र भर आती…

लिखने को कितना कुछ है
हमारे पास,
पर प्यार की बातें
पाती नहीं बन पातीं…

सहने को यादें ही
एकमात्र सहारा हैं,
कि जिनके बिना
हमारी दुनिया बस नहीं पाती…

कहने को मौन
आँसुओं की भाषा है,
जो बहकर ही
सब कह जाती है…

कि मजबूर इस कदर हैं
कि हर पल हम बिखर जाएँ,
पर रिश्ते इतने मज़बूत हैं
कि कोई लहर
हिला नहीं पाती…

कि यक़ीन तो
एक पल का भी नहीं,
पर भरोसा इस कदर है
कि सदियाँ
उसमें समा जाती हैं…

कि उलझनें बहुत हैं मगर,
उलझने से पहले ही
सुलझ जाती हैं…

कि इसे क्या नाम दूँ,
बस यही
सोचते रह जाती हूँ…

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