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दूरी में खड़े एक जोड़े का भावुक दृश्य, जो अनकहे रिश्ते और गहरी भावनाओं को दर्शाता है

ये कहाँ आ गए हम…

कभी-कभी रिश्तों को नाम देना आसान नहीं होता, क्योंकि वे शब्दों से कहीं ज्यादा गहरे और जटिल होते हैं। यह कविता उसी अनकहे रिश्ते की कहानी कहती है, जिसमें दो लोग साथ तो हैं, लेकिन उस साथ की परिभाषा खुद उनसे भी छुपी हुई है। यह रिश्ता आदत भी है, जरूरत भी, और एक ऐसी भावनात्मक डोर भी, जिसे तोड़ना संभव नहीं लगता।

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किस विध लूँ तेरी थाह

यह कविता एक गहरी, रहस्यपूर्ण और रूमानी अभिव्यक्ति है — प्रेम में डूबे एक हृदय की उस छटपटाहट और जिज्ञासा की, जो अपने प्रिय की भावनाओं, मौन संकेतों और अस्तित्व को पूरी तरह समझना चाहता है। शीर्ष पंक्ति “किस विध लूँ तेरी थाह प्रिय” पूरे काव्य का केंद्रीय भाव है — यह प्रश्न नहीं, एक आकुल जिज्ञासा है, एक समर्पण है।

कविता में प्रिय को एक ऐसी नदी के रूप में देखा गया है, जो सतह पर तो लहराती, मुस्कराती, बलखाती दिखती है, लेकिन भीतर कहीं गहराई में कई सदियों से प्यासेपन की पीड़ा को संजोए हुए है। वह प्रिय किसी दरिया से मिलन नहीं चाहता, फिर भी एक अनकहा प्रवाह है, जो उसे बहाए लिए जाता है — यही वह विरोधाभास है जिसे कवि समझना चाहता है।

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पास होकर भी दूर: दो दिलों की ख़ामोश मोहब्बत

“कुछ रिश्ते होते हैं, जो बिना नाम के भी ज़िंदा रहते हैं। न वे समाज से मान्यता चाहते हैं, न किसी वादे की ज़रूरत होती है। बस एक मौन जुड़ाव होता है—जिसमें न कोई अधिकार होता है, न अपेक्षा। चितरा और सत्य का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही था—जहां भावनाएं थीं, गहराई थी, पर कोई दावा नहीं था। यह प्यार था, लेकिन ऐसा प्यार जो छूने से पहले ही समझ जाता है, जो मिलने से पहले ही विदा ले लेता है। एक ऐसा रिश्ता जिसे शब्द नहीं बाँध सकते, पर आत्मा पहचान लेती है।”

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