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हृदय की संवेदना से…

खिड़की के पास बैठा एक व्यक्ति गहरे विचारों में, आत्मचिंतन का प्रतीक "जब उत्तर बाहर न मिले, तो भीतर झाँकना सीखो।"

प्रतिभा दुबे, प्रसिद्ध लेखिका, ग्वालियर

स्व-चिंतन से हर राह निकलती,
कभी तो इसे आज़माया करो।

कहानियाँ यूँ ही न सुनाया करो,
सुख-दुख की बदली है ये जीवन।

हार मान यूँ न बैठ जाया करो,
कभी खुद से प्यार जताया करो।

जब तक कोई अंतर्मन न छू ले,
उसे भेद सारे न तुम बताया करो।

दिल-दिमाग से एकाग्रचित होकर,
अपनी उलझनें खुद सुलझाया करो।

नहीं किसी के विश्वास के ऊपर ही,
यूँ ही न अपना विश्वास जताया करो।

जब तक कोई मन में न समा जाए,
तब तक तुम न मन की बताया करो।

ये दुनिया का खेल है अजब निराला,
तुम धोखा न किसी से यूँ खाया करो।

खुद को इतना तुम मज़बूत बना लो,
हृदय की संवेदनाओं से खुद पार पाया करो।।

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