
प्रतिभा दुबे, प्रसिद्ध लेखिका, ग्वालियर
स्व-चिंतन से हर राह निकलती,
कभी तो इसे आज़माया करो।
कहानियाँ यूँ ही न सुनाया करो,
सुख-दुख की बदली है ये जीवन।
हार मान यूँ न बैठ जाया करो,
कभी खुद से प्यार जताया करो।
जब तक कोई अंतर्मन न छू ले,
उसे भेद सारे न तुम बताया करो।
दिल-दिमाग से एकाग्रचित होकर,
अपनी उलझनें खुद सुलझाया करो।
नहीं किसी के विश्वास के ऊपर ही,
यूँ ही न अपना विश्वास जताया करो।
जब तक कोई मन में न समा जाए,
तब तक तुम न मन की बताया करो।
ये दुनिया का खेल है अजब निराला,
तुम धोखा न किसी से यूँ खाया करो।
खुद को इतना तुम मज़बूत बना लो,
हृदय की संवेदनाओं से खुद पार पाया करो।।
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