
सीमा शर्मा “तमन्ना” नोएडा (उत्तर प्रदेश)
हम अक्सर कहते हैं कि परिस्थितियाँ ही हमें बनाती या बिगाड़ती हैं, किंतु सत्य यह है कि हमारी अपनी मानसिकता और उससे गढ़े गए नकारात्मक एवं सकारात्मक विचार ही हमारे व्यक्तित्व के सबसे बड़े निर्माता होते हैं। ज़रा सोचकर देखिए—एक ही परिस्थिति में कोई टूट जाता है और कोई निखर जाता है। यहाँ अंतर सिर्फ़ उन दोनों की मानसिकता और उसमें पनप रहे विचारों का ही होता है। जो मन में चलता है, वही जीवन में उतरता है।
यदि आपके अंतस में शिकायतें और गुबार हैं, तो परिणामस्वरूप वही बाहर संघर्ष के रूप में दिखाई देगा। वहीं दूसरी ओर, यदि आपके अंतस में विश्वास है, तो किसी भी कठिन डगर के रास्ते स्वतः ही खुलते चले जाते हैं।
अतः परिस्थितियाँ बदलने से पहले अपनी सोच और भावों को बदलें। अपने मन-मस्तिष्क को वही दें, जो आप वास्तव में अपने जीवन में देखना चाहते हैं या जिसकी अपेक्षा रखते हैं। किंतु इन सभी में सर्वोपरि शांति, शक्ति, प्रेम और स्पष्टता रखें।
क्योंकि यह जीवन है यह कोई तीन घंटे की आपके मनमुताबिक देखी गई फ़िल्म नहीं है। उस फ़िल्म का निर्माता एक व्यक्ति होता है, जिसने कहानी अपने अनुसार गढ़कर जीवन का मात्र एक पहलू दिखा दिया। आप भी यदि अपने जीवन के प्रति यही भाव रखें, तो याद रखिए. जीवन बहुत लंबा है और इसके न जाने कितने ही पहलुओं को हमें जीना होता है। फिर हमारा दृष्टिकोण इस जीवन के प्रति इतना संकीर्ण क्यों है…?
दोस्तों, परिस्थितियों को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति को बदलें, प्रसन्न रहें और सभी को प्रेरित करें। क्योंकि एक सकारात्मक सोच पूरे परिवार के लिए हितकारी होती है. परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र के लिए।
कई लोग कहते हैं कि ये बातें सुनने और पढ़ने में ही अच्छी लगती हैं, वास्तविकता नहीं हैं। तो सुनिए यहीं से आपकी स्वयं एवं दूसरों के जीवन के प्रति नकारात्मकता प्रकट होती है। क्योंकि जब आप स्वयं ऐसी सोच रखते हैं, तो दूसरों को आप क्या दे पाएँगे?
इसलिए स्वयं से शुरुआत कीजिए। कोई क्या कर रहा है या क्या नहीं कर रहा.छोड़िए। बस यह भाव रखिए कि एक दिन अवश्य सब अच्छा ही होगा…!
