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स्त्री के संघर्ष और त्याग को कर्ण के रूपक में दर्शाता स्त्री विमर्श

कहाँ आसान है एक स्त्री का कर्ण हो जाना

एक स्त्री अपने जीवन में कितने कवच-कुंडल धारण करती है? प्रेम, जिम्मेदारियों, सामाजिक मर्यादाओं और अपने अस्तित्व के बीच संघर्ष करती स्त्री के अंतर्द्वंद्व को कर्ण के रूपक में प्रस्तुत करता संवेदनशील लेख.

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रात के शांत वातावरण में अकेली स्त्री, चाँदनी और स्मृतियों में डूबी भावनात्मक अनुभूति का दृश्य।

स्मृति और… तुम!

स्मृति और… तुम!’ प्रेम और अनुपस्थिति के सूक्ष्म भावों को गहरी संवेदना के साथ अभिव्यक्त करती कविता है। स्मृतियों की नमी, इंतज़ार की सीलन और भीगे सन्नाटे के बीच यह रचना बताती है कि प्रेम को अंत तक ढोने के लिए शब्द नहीं, स्मृति चाहिए।

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खुद से प्यार: एक छोटी शुरुआत, एक बड़ी मुस्कान

हम अक्सर दूसरों को खुश करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि खुद से प्यार करना भूल जाते हैं। लेकिन असली सुकून तब मिलता है जब हम खुद को अपना फेवरेट बना लेते हैं। खुद से बात करना, अपने साथ समय बिताना, और खुद को समझना – यही तो है सच्चा प्यार। क्योंकि जब आप खुद से प्यार करेंगे, तभी दुनिया भी आपको उसी नजर से देखेगी।

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प्रेम…हुई शाम उनका ख़्याल आ गया… 🎵🎶

रात की निस्तब्धता में प्रेम का प्रश्न भीतर गूंज रहा था। संगीत की सधी स्वर लहरियाँ मन को ऐसे छू गईं कि सब तर्क-वितर्क, प्रश्न-उत्तर उस तकिए पर ढुलकी एक बूंद में विलीन हो गए… जैसे प्रेम समझाने का नहीं, केवल महसूस करने का विषय हो।

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छोटी कहानियों में बड़े अर्थ

रश्मि चौधरी का लघुकथा संग्रह ‘संवेदनाओं का स्पर्श’ समकालीन हिंदी लघुकथा को एक नई चेतस दिशा प्रदान करता है। ये लघुकथाएं केवल आक्रोश, टकराव या विरोध का आख्यान नहीं हैं, बल्कि इनमें मानवीय सहकार, संवेदनात्मक विस्तार और यथार्थ का सधा हुआ समन्वय देखने को मिलता है। संग्रह की रचनाएं जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों को बड़ी आत्मीयता और वैचारिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। कभी मनोविज्ञान की परतें खुलती हैं, तो कभी समाजशास्त्रीय संदर्भों का मूक आकलन होता है। ‘दुकानदारी’, ‘अन डू’, ‘सम्मान’, ‘मान्यताएं’ जैसी लघुकथाएं अपनी गहनता और प्रतीकों के माध्यम से पाठक के मन को छू जाती हैं। लेखिका की भाषा-संरचना और कथ्य विन्यास लघुकथा को संवेदना की ऐसी धरती पर स्थापित करते हैं, जहाँ विचार और अनुभूति दोनों का संतुलन है।”

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