स्त्री संघर्ष
थरथराता सच
रश्मि लहर, लखनऊ सोना धूप में बैठकर अपने लंबे बालों को सुखा रही थी। उसके बाल उसके व्यक्तित्व का प्रभावशाली हिस्सा थे। वह अपनी बड़ी-बड़ी तथा मासूमियत से भरी ऑंखों को बंद करके धूप का आनंद ले रही थी। जाड़ों में पुराने लखनऊ की छतों पर अलग ही रौनक होती है। सोना को यह सोचकर…
कीचड़ का कमल
कीचड़ का कमल” प्रेम और जिम्मेदारियों के बीच फँसी एक स्त्री के अंतर्द्वंद्व को बखूबी उकेरती है। यह कविता बताती है कि हर प्रेम कहानी मुकम्मल नहीं होती कभी परिस्थितियाँ, कभी परिवार और कभी सच का सामना रिश्तों को बदल देता है। यहाँ प्रेम पवित्र है, लेकिन आत्मसम्मान और परिवार की गरिमा उससे भी बड़ा सत्य बनकर उभरते हैं।
मरु-स्त्री
मरु-स्त्री” एक ऐसी कविता है जो रेगिस्तान की कठोरता के बीच जीती स्त्री के भीतर छिपी अनकही विरासत और पीड़ा को उजागर करती है। यहाँ प्यास केवल एक शारीरिक अवस्था नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक मौन धरोहर है। यह स्त्री रेत की तरह बिखरती नहीं, बल्कि फैलकर अपने अस्तित्व को जीवित रखती है। उसकी हर चाल, हर चुप्पी और हर प्रतीक्षा में संघर्ष, सहनशीलता और जीवन की अदम्य शक्ति झलकती है जो मरुस्थल की सूनी धरती में भी हरियाली की तरह आशा जगाती है
श्मशान से लौटती साँसें…
श्मशान की राख से लौटकर जब ज़िंदगी की जिम्मेदारियाँ बाँहों में भर ली जाती हैं—तब यह कविता मृत्यु से आँख मिलाकर जीवन को चुनने का साहस बन जाती है।
अधूरी रजाइयाँ
बारह साल की शादी के बाद भी घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी थी. हरमन और परमिंदर के बीच रिश्ते की खामोशी धीरे-धीरे आदत बन चुकी थी. बेरोज़गारी, बेबसी और अधूरेपन के बीच हरमन की माँ अपनी सुई से रजाइयाँ सीती रही—हर टाँके में एक टूटी हुई उम्मीद पिरोती हुई.
परमिंदर ने हालात से लड़ने की कोशिश की, मगर समाज की नजरें और रिश्तों की उलझनें उसे उस मोड़ पर ले आईं, जहाँ सही और गलत के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है. जब एक बच्ची जन्मी, तो सच सब जानते थे, पर खामोशी ने ही इज़्ज़त का कंबल ओढ़ लिया.
खानदानी लोग
मेहनत और आत्मसम्मान के बल पर आगे बढ़ी मीना, शोध के दौरान अपने मार्गदर्शक राहुल से प्रेम कर बैठती है। तीन वर्षों के संबंध के बाद राहुल जाति-घमंड और स्वार्थ के आगे प्रेम को नकार देता है। मीना के सपने, विश्वास और आत्मा सब एक साथ टूट जाते हैं, और वह सामाजिक क्रूरता का नंगा सच देखती है।
अगर मैं किसी सुबह न उठूँ…
जिस सुबह वह नहीं उठी, वह हार नहीं थी वह एक चुप विदाई थी।रोज़ के झगड़ों, टूटती उम्मीदों और खुद को खो देने की थकान का अंत। जिसे वह प्रेम समझती रही, वह पत्थर निकला, और जिसे वह बचाती रही, वही उसे तोड़ता रहा।
अब अहिल्या को राम नहीं मिलते…
पुलिस की रेड पड़ी और इस बार वह पकड़ी गई। थाने में महिला पुलिस फटकार लगा रही थी—”शर्म नहीं आती तुम्हें शरीर बेचते हुए? तुम औरत के नाम पर कलंक हो!” वह सिर नीचा किए सुनती रही। सुन-सुनकर पत्थर हो गई। यह लताड़ पहली बार नहीं पड़ी थी, न जाने कितनी बार लोगों ने उसकी औक़ात उसे दिखाई है। वह यह भी जानती है कि दिन में औक़ात दिखाने वाले, रात में उसके दरवाज़े पर खड़े रहते हैं।
- 1
- 2
