
रश्मि लहर, लखनऊ
सोना धूप में बैठकर अपने लंबे बालों को सुखा रही थी। उसके बाल उसके व्यक्तित्व का प्रभावशाली हिस्सा थे। वह अपनी बड़ी-बड़ी तथा मासूमियत से भरी ऑंखों को बंद करके धूप का आनंद ले रही थी। जाड़ों में पुराने लखनऊ की छतों पर अलग ही रौनक होती है। सोना को यह सोचकर बहुत अच्छा लगता था कि उसके मोहल्ले की छतें एक-दूसरे के घरों से जुड़ी थीं। मीठी-मीठी धूप में महिलाऍं चावल बीनती या सब्जी काटती हुई एक-दूसरे से बतिया रही थीं। सोना को अपनी माँ की याद आ रही थी। उनके सामने वह जब भी बाल धोकर छत पर सुखाने बैठती थी तो माँ धीमे-धीमे उसके बालों में कंघी करने लगती थीं। कुछ देर बाद वे उसके कंधे पर सिर टिकाकर कहती थीं-
“तुम्हारे बाल तुम्हारी नानी के बालों जैसे हैं! एकदम मुलायम और सीधे। सच्ची सोना! तुम्हें देखती हूँ तो अम्मा की याद आ जाती है!” सोना उनके सिर पर अपना सिर टिका देती और कहीं खोई रहती!
मम्मी के हाथों की छुवन, उनकी धोती की गुँधाई सी महक और उनकी पनीली सी ऑंखें सोना के लिए दुनिया की सबसे बड़ी नियामत थी। ‘महर्षि विद्या मंदिर स्कूल’, बाराबंकी आने-जाने में वह बहुत थक जाती थी। जैसे ही वह घर में प्रवेश करती, माँ लपक कर उसका हाथ पकड़ लेती।
“रास्ते में सब ठीक रहा था न? किसी ने बदतमीजी तो नहीं की? मेरा दिल घबराता रहता है, जब-तक तू घर नहीं आ जाती है! ” कहते-कहते माँ चाय बनाने चली जाती। सोना दालान में पड़े तख्त पर बैठ जाती और मुस्कराते हुए जवाब देती थी-
“जब तुम्हारी इतनी दुआएं मेरे साथ हैं, तो भला कोई मुझे कैसे परेशान कर सकता है, बताओ?” माँ आश्वस्त हो जातीं और प्यार से दो कप चाय ले आतीं। न जाने कितनी बार सोना ने मना किया है कि वे चाय न बनाया करें, पर वे मानती ही नहीं थीं। नानी के भजन की गुनगुनाहट और अदरक कूटने के ढंग से सोना माँ का मूड जान लेती थी। पैतृक घर में सोना अकेली बची थी। माँ के हाथों से बनी चाय की याद आते ही सोना व्याकुल हो उठी! उसकी ऑंखों से ऑंसू बहने लगे।
सहसा सामने मिश्रा चाचा की छत वाले दरवाजे की आहट पाकर वह वर्तमान में लौट आई। उसने बड़ी सुन्दर सी एक बूढ़ी दादी सरीखी महिला को चाचा की छत पर देखा । मक्खन जैसा उजला रंग, दुबली-पतली वे दादी उसको अपनी ओर खींचने लगीं। तरह-तरह के प्रश्न उसके मन में आने लगे।
“ये कौन हैं? इनको पहले तो कभी नहीं देखा! चाची से पूछते हैं अभी” सोचते-सोचते सोना एकदम से चौंक पड़ी। सामने वाली दादी एन्डराएड फोन पर उॅंगली चला रही थीं। उनके चेहरे पर एक शांत मुस्कराहट थी। उसे बड़ा अच्छा लगा।
“अरे वाह! ये तो एन्डरायड फ़ोन भी चला लेती हैं?!” सोचते हुए उसने छत की तरफ़ देखा तो वह दंग रह गयी। वे दादी दो जीना चढ़तीं, फिर कूद पड़तीं। “अरे! बड़ी स्मार्ट हैं ये, पल में यहाँ, पल में वहाँ! पर कहीं गिर न जायें”, सोचते हुए सोना मुस्कराई-
“ये बूढ़े लोग अपने को बूढ़ा समझते ही नहीं हैं! माँ भी तो ऐसे ही काम करती थीं। टाँड़ पर चढ़कर सफाई करते समय ही तो वे गिरी थीं, सर पर कितनी चोट लग गई थी! उफ़ ये बूढ़े लोग अपने को बूढ़ा क्यों नहीं समझते?” सोचते हुए वह टहलने लगी।
दादी की तरफ़ बार-बार उसकी दृष्टि जाती। वे कभी रस्सी कूदने का उपक्रम करती दिखतीं तो कभी तेज-तेज चलतीं। “बड़ी एक्टिव हैं भाई ये, शायद रोज योगा करती होंगी” सोचकर उसने उनकी तरफ़ हाथ हिलाया। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी जिज्ञासा बढ़ रही थी। चाची के बेटे को वह दद्दा कहती थी। वे पुलिस विभाग में बड़े अफसर थे। उनके आने-जाने का समय तय नहीं था। रोज दादी को छत पर देखकर उसके मन में विचार कौंधता -“दादी को खाना कौन देता होगा? ये दादी इतनी देर तक छत पर क्यों रहती हैं?” दादी की अजीबोगरीब हरकतें देखकर सोना को अजीब सा लगने लगा! वह अपनी उलझने भी भूलने लगी थी।
इधर सोना के स्कूल में सेमिनार था, वरिष्ठ शिक्षिका होने के कारण उसपर बहुत जिम्मेदारी थी। आज कई दिनों बाद वह फिर छत पर आई। सबकी छतों पर वही रोज वाली व्यवस्था! कोई मटर छीलने में मशगूल तो कोई चावल बीनने में लगा था । कुछ बच्चे पतंगबाजी में लगे थे। सामने दादी! आज उनके चेहरे पर वो लुनाई नहीं दिख रही थी। सलवार-कुर्ता पहने वे बड़ी कठोर सी लग रही थीं। हाथों में कंगन भी नहीं थे। सोना ने उन्हें देखते ही नमस्ते के लिए हाथ जोड़ दिया। उन्होंने कोई रिस्पांस नहीं दिया। सोना ने बुरा नहीं माना। उसके मन में विचार आया कि ये बूढ़े लोग थोड़े मूडी तो होते ही हैं। होंगी किसी चिंता में! अब माँ का मूड भी तो अक्सर खराब हो जाता था। जबकि वे इतनी बूढ़ी नहीं थीं फिर भी सोना को उनका स्वभाव कभी-कभी अजीब लगता था! एक बार तो हद ही हो गई थी, जब उन्होंने सोना से कहा था-
“जा सोना! एक बंदूक खरीद ला!”
“माँ! कैसी बातें कर रही हो? अब बंदूक का क्या करोगी?”
“अरे वो अनिल है न, उसको उड़ाना है बस!”
“वो कोने वाले अनिल चाचा को? अरे क्यों भाई? उन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है माँ?”
“तुम नहीं समझोगी सोना! नई-नई ब्याह के आई थी मैं! पहली होली थी। उन्होंने मुझे अचानक पीछे से आकर ऐसे पकड़ा था कि मैं तिलमिला उठी थी! पैर छूने के बहाने ऑंगन में आ गया और…” बताते-बताते वे गुस्से से भर उठी थीं। “मेरा बस चलता न तो उसी वक्त उसको मार-मार कर अधमरा कर देती! ये आदमी लोग आखिर समझते क्या हैं हम लोगों को!”
“अरे माँ! इतनी पुरानी बात को अबतक दिल से लगाए बैठी हो?” कहते हुए सोना की आवाज काँप गयी थी।
“जानती हो सोना! कोई स्त्री अपने तन पर किये गये अत्याचार को, अनचाहे अश्लील स्पर्श की छुवन को कभी नहीं भुला सकती है, कभी नहीं! वह घिनौना पल स्त्री-जीवन के हर सुख पर भारी रहता है! उस दिन की याद आते ही मेरा मन असह्य पीड़ा से कराह उठता है, और, मन करता है तुरंत वध कर दूँ उसका!” कहते हुए उनका गौरवर्णीय चेहरा क्रोध से लाल हो गया था।
“मेरी प्यारी माँ! अब उस घृणित दिन को भूल जाओ न, प्लीज़! अपना ब्लड प्रेशर सॅंभालो, हाई हो गया तो फिर बहुत दिक्कत हो जायेगी हम दोनों को! चलो आज कुछ अच्छा बनाते हैं!” कहते हुए सोना उनको किचन की तरफ़ ले जाने लगी थी।
उसे पता था माँ अपना सारा तनाव किचन की साफ-सफाई में रम कर भूल जाती हैं। उसके मन में भावनाओं की उठा-पटक चालू थी। कैसे सहा होगा माँ ने वह गन्दा स्पर्श! कितनी वितृष्णा हुई होगी उनको पुरुष के इस रूप को देखकर! कोई भी स्त्री यह कल्पना करके ससुराल कहाँ आती होगी कि उसका अपने ही देवर या अन्य रिश्तेदार के द्वारा शारीरिक शोषण किया जायेगा। उफ़! पापा ने भी मना नहीं किया उनको। आख़िर क्या समझते हैं ये लोग पत्नी को? क्या पत्नियाँ खरपतवार की तरह होती हैं जो कहीं भी उग आयें, जिसे कोई भी छू ले, नोच ले या तोड़ दे?” वह अपनी माँ की बेबसी तथा पीड़ा की अनुभूति कर पा रही थी। इतने वर्षों बाद भी माँ उस लिजलिजी छुवन की स्मृति से बाहर नहीं आ पाईं थीं । आती भी कैसे? एक स्त्री की संवेदनशीलता की गहराई को कोई आम आदमी कहाँ समझ सकता है? किसी की एक गंदी दृष्टि स्त्री को आजीवन काँटे की भांति चुभती रहती है। यह सब सोचते हुए उसने माँ को कसकर गले से लगा लिया था। माँ का फूट-फूट कर रोना उसे अभी तक याद है!
सोना विचारों और स्मृतियों के मध्य उलझ गयी थी। माँ को गले लगाये हुए उसने सोचा था, सच ही तो कहा माँ ने! मैं भी कहाँ भूल पाई पी.टी. वाले सर का वह स्पर्श! एक गंदी सिहरन से सोना का सर्वांग काँप उठा था!
सोना को अतीत अपनी ओर खींच रहा था ! कक्षा सात का वह घिनौना दिन, जब पी.टी. वाले सर ने अचानक उसके दोनों हाथों को पकड़ लिया था और वह उस अनजाने स्पर्श के कुत्सित भाव की अनुभूति कर पलभर के लिए जड़ हो गई थी! फिर यकायक उसने सबके सामने चीख़कर कहा था -“छूईये मत, मुझे पी.टी. करना आता है!” कहकर वह मुड़कर जाने लगी थी कि उन्होंने पीछे से उसकी शर्ट पकड़ ली थी और एक तेज आवाज के साथ एक चाटा उसके गाल पर पड़ा था -चटाक! वह अपमान से तड़प गई थी! पलभर के लिए वह कुछ समझ नहीं पाई थी! फिर उनको देखकर वह बहुत तेज आवाज में “छि:” कहकर बाहर निकल गई थी! उस दिन के बाद से वह उस स्कूल में नहीं गयी थी। उसे याद है कि घर पहुँच कर उसने माँ से जैसे ही अपने तमाचे के बारे में बताया था, माँ ने उसे प्यार से चिपका लिया था और कहा था कि “चल! तेरा नाम किसी अच्छे स्कूल में लिखवा दूँगी!” एक अजीब सी गिजगिजाहट से उसका मन घिना गया था। आज सोना को लग रहा था कि यही कारण रहे होंगे जो उसका मन शादी से हट गया था!
अतीत की सुधियों से अकुला कर सोना नीचे सोने चली गई। कभी-कभी यादें मन को अपनी गिरफ्त में ऐसे लेती हैं कि इंसान हक्का-बक्का रह जाता है! अतीत के अनगिनत लम्हें मन को अपने वश में कर लेते हैं! घंटे भर बाद सोना को लगा जैसे गली में शोर सा हो रहा है। वह अलसायी सी उठी और दरवाजा खोलते ही दंग रह गयी!
गली में लोग ही लोग! “अरे! इतनी देर में यहाँ क्या हो गया!” सोचते हुए उसने गर्दन घुमाई तो देखा सामने दादी खड़ी हैं! मुँह पर वही सवेरे वाली कठोरता, हाथ में हथकड़ी, महिला पुलिस भीड़ को ठेलती हुई! बाहर खड़े एक लड़के से उसने पूछा –
“क्या हुआ भैया?” पूछते समय वह थोड़ा सा डर गयी।
“अरे दीदी! ये बुढ़िया है न? यह कातिल निकली! इसने वो बर्फ की दुकान वाले संजू का मर्डर कर दिया है!”
“क्या!” कहते हुए सोना को झुरझुरी सी लगी।
“हाँ दीदी! चार गोली मारी हैं उसको! दोनों हाथों पर और…फिर खुद ही पुलिस स्टेशन पहुच गयी थी सरेन्डर करने! वहाँ लिखकर दे आयी है कि इसने पूरे होशो-हवास में उसको मौत के घाट उतारा है। लिखा है मुझको फाँसी दी जाए, ये ग़लत पुलिस चौकी चली गयी थीं, तो पुलिस इनको इधर से अपनी तरफ़ वाली पुलिस चौकी ले जा रही है!”
“क्या…” कहते हुए सोना चीख पड़ी! “पर इन्होंने ऐसा क्यों किया?” पूछते हुए सोना की आवाज थर्रा उठी!
“अरे दीदी! पता चला है कि इनके पति की मृत्यु बहुत पहले हो गयी थी। तब इनका बेटा बहुत छोटा था! ये अपनी बहन के यहा रहने आ गई थीं। एक दिन बहन सपरिवार कहीं गयी थीं। ये बला की सुन्दर थीं। संजू इन पर बुरी नज़र रखे था। मौका पाकर उसने इनकी इज्जत लूट ली थी! परिस्थितियों की मारी ये रिपोर्ट लिखवाने पुलिस चौकी गयीं तो संजू चिढ़ गया और उसने घर आकर इन दोनों को बहुत मारा। इतना मारा कि इनका बेटा अपाहिज हो गया था और इनको एक आंख से दिखना बंद हो गया था!” बताते हुए वह रुका। फिर आगे बोला –
“दीदी! फिर ये यहाँ से छुप-छुपाकर कहीं चली गई थीं। किसी को इनकी कोई ख़बर नहीं मिली थी। सुना है कुछ दिन पहले इनके बेटे का देहांत हो गया था। वर्षों बाद ये अपनी बहन से मिलने यहाँ आ गयी थीं। बहन कहीं बाहर गयी थीं। इनकी बहन का बेटा पुलिस विभाग में अफसर है। उनसे इन्होने एक-दो दिन पहले बन्दूक देखने के लिए माँगी थी। कोई सोच नहीं सकता था कि ये बुढ़िया इतनी निर्ममता से किसी का खून कर देगी! कलजुग है, घोर कलजुग!” कहते हुए वह भीड़ का हिस्सा बनकर निकल गया और सोना दरवाज़ा पकड़े स्तब्ध खड़ी रह गयी! उसके कानों में माँ के शब्द गूँजते जा रहे थे-“सोना! कोई स्त्री अपने तन पर किये गये अत्याचार को तथा अनचाहे अश्लील स्पर्श को कभी नहीं भूल सकती, कभी नहीं!’

बहुत बहुत शुभकामनायें लेखन के लिए
स्त्री भावनाओं को बयान करती बेहतरीन कहानी