रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर
अगर मैं किसी सुबह न उठूँ,
तो समझ लेना ,मैं हार गई थी।
तुमसे भी… और खुद से भी।
रोज़-रोज़ के झगड़ों ने मेरी रातों की नींद पहले ही छीन ली थी।
सुबह की शुरुआत तानों से होती और शाम आरोपों पर खत्म।
मैं हर दिन यह सोचकर उठती थी कि आज शायद तुम बदल जाओगे,
और हर रात इस सच के साथ सोती थी
कि बदलते-बदलते मैं खुद को ही खो चुकी हूँ।
तुम्हें अपना बनाने की कोशिश में
मैंने अपने कई रिश्तों से दूरी बना ली।
कुछ मजबूरी में,
कुछ इस भ्रम में कि प्रेम में त्याग ही सबसे बड़ा धर्म होता है।
मुझे नहीं पता था कि
जिसे मैं ईश्वर समझकर पूज रही हूँ,
वह भीतर से पत्थर है।
तुम्हारी आँखों में कभी शर्म नहीं थी,
और मैं हर बार लिहाज़ करती रही।
तुम्हारी कठोर चुप्पी को
मैं तुम्हारी गहराई समझती रही।
तुम्हारे अहंकार को
मैं तुम्हारा आत्मसम्मान कहकर सहती रही।
जिस सुबह मैं नहीं उठी,
वह सुबह दरअसल मेरी विदाई थी
इस घर से,
इस रिश्ते से,
और उस स्त्री से
जो हर हाल में निभाने की ज़िद किए बैठी थी।
तुम कहते थे
“मर क्यों नहीं जाती?”
शायद तुम नहीं जानते थे
कि कोई रोज़-रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरता है
तो एक दिन बस उठना छोड़ देता है।
उस दिन घर में वही दीवारें थीं,
वही सामान,
वही खामोशी
बस आँखों की चमक नहीं थी,
आवाज़ की गरमाहट नहीं थी,
और इंतज़ार की आदत भी नहीं थी।
रो लेना अगर चाहो,
दुनिया को दिखाने के लिए।
या फिर अकेले में,
अपने खोखलेपन को महसूस करने के लिए।
तुम न अच्छे प्रेमी बन सके,
न पति,
और यह कड़वा सच
तुमसे कोई नहीं कहेगा
सिवाय तुम्हारी अपनी तन्हाई के।
मैं जानती हूँ,
तुम खुद से कहोगे कि तुम जीत गए।
पर सच यह है कि
जिस दिन मैं चली गई,
उस दिन तुम्हारा अहंकार जीतकर भी हार गया।
अब तुम अकेले हो
और शायद पहली बार
खुद से पूछोगे,
“क्या यही है मेरी ज़िंदगी?”

मार्मिक सत्य
Bahut khoob
सच तो ये है कि ताने न मारते तो भी जिंदगी चल रही थी, तानों ने इसे और दूभर कर दिया पर यह कभी किसी ने सोचा ही नहीं कि ताने मारे बिना भी जिंदगी चलती है, और आसान, अगर सकूं चाहिए तो परिस्थिति बदल दो या सह लो इसी में भलाई है l पर लोग ऐसा नहीं करते, क्यों छलावे में जीते हैं लोग, दुख लगता उन लोगों को देखकर जो अपनों को जीते जी पानी का नहीं पूछते और मरने के बाद जयंती मनाते हैं