अख़बार पढ़ने के चक्कर में

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज पुणे

उन दिनों हम अख़बार की दुनिया में धीरे-धीरे रच-बस गए थे. डंपिंग तक पहुँचना, बंडल बाँधना, अख़बार उठाना और बाँटना.सब रोज़मर्रा का काम बन गया था. मेहनत ज़रूर थी, पर इसका सबसे बड़ा सुख यह था कि हर तरह के अख़बार हमें मुफ्त में पढ़ने को मिल जाते थे.राजनीति से ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी. मन लगता था आम लोगों की समस्याओं में, सामाजिक कार्यक्रमों में, छात्रों की परेशानियों में और हाँ, फिल्मी खबरों में भी. यह जानते हुए भी कि फिल्मी खबरों में सच कम और गॉसिप ज़्यादा होती है, उन्हें पढ़ने का आकर्षण बना रहता था. एक दिन अख़बार बाँधते-बाँधते एक खबर पर नज़र अटक गई.
तारीख थी26 जुलाई 1982.
बेंगलुरु में कुली फिल्म की शूटिंग चल रही थी.एक एक्शन सीन में पुनीत इस्सर को अमिताभ बच्चन के चेहरे पर घूंसा मारना था और अमिताभ को टेबल पर गिरना था. मेकर्स ने बॉडी डबल से सीन करने का सुझाव दिया, लेकिन अमिताभ बच्चन ने खुद सीन करने की ज़िद की.लाइट जली, कैमरा चला, एक्शन हुआ.सीन एकदम परफेक्ट रहा. तालियाँ बजीं. लेकिन कुछ ही देर बाद अमिताभ बच्चन के पेट में दर्द शुरू हो गया. बाहर से कोई चोट नज़र नहीं आई, इसलिए इसे मामूली समझ लिया गया.


मलहम लगाया गया, पेन किलर दिया गया और बात को टाल दिया गया.अगला दिन भी दर्द कम नहीं हुआ. तीसरे दिन एक्स-रे में सच्चाई सामने आई. आंत फट चुकी थी. संक्रमण पूरे शरीर में फैलने लगा था. तेज़ बुखार, उल्टियाँ, दिल की धड़कन तेज़ और फिर वह कोमा में चले गए. तुरंत ऑपरेशन हुआ, लेकिन हालत संभली नहीं.उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल रेफर किया गया. आठ घंटे तक चला ऑपरेशन. उस समय पूरा देश उनके लिए दुआ कर रहा था.
अख़बारों में हर दिन स़िर्फ एक ही सवाल था..
अमिताभ बच्चन कैसे हैं?डॉक्टरों की मेहनत और करोड़ों चाहने वालों की दुआओं से आखिरकार वे ठीक हुए और घर लौटे.
यह घटना मुझे आज भी पूरी तरह याद है.क्योंकि उस दिन के बाद मेरी आदत बदल गई.अब मैं रोज़ सुबह सबसे पहले अख़बार में अमिताभ बच्चन की खबर ढूँढता था. उसे पढ़ लेने के बाद ही बाकी पन्ने पलटता. वे स़िर्फ एक अभिनेता नहीं थे, मेरे पसंदीदा कलाकार थे. आज भी उनकी कोई फिल्म टीवी पर आ जाए,तो चैनल बदलने का मन नहीं करता. उस दौर में उनसे मिलने का सपना देखा था
और ज़िंदगी ने वह सपना चार बार पूरा किया.एक बार प्रेस कॉन्फ्रेंस में,एक बार आज की रात ज़िंदगी के सेट पर, और दो बार कौन बनेगा करोड़पति के मंच पर.

अब समझ आता है.अख़बार स़िर्फ खबरें नहीं होते, कभी-कभी वे यादों को भी बाँध लेते हैं.

9 thoughts on “अख़बार पढ़ने के चक्कर में

  1. अमिताभ बच्चन उसे दूर के सबसे लोकप्रिय कलाकार थे वह उनके आने के बाद कॉमेडी

    चरित्र अभिनेता… यह सारे रोल सिर्फ और सिर्फ वह अकेले करते थे ।जब कुली पिक्चर में यह हादसा उनके साथ हुआ तो हम सभी यही खबर देखते थे कि वे अब कैसे हैं ।हमारी प्रार्थना में भी उनकी सलामती मांगी जाती थी। आपकी आखरी लाइन दिल को छू गई …अखबार सिर्फ खबरें नहीं होते वे यादों को भी बांध लेते हैं…👏👏👏

    1. यह बात सच है की अखबार यादों को भी बांध लेते हैं। अखबार पढ़ने का भी अपना एक नशा है। आपका लेख पढ़ते ही मुझे मेरे एक परिचित की याद आ गई। जो अखबार में से कोई विशेष लेख और खबरों को काटकर उनका लेमिनेशन करवा कर अपने पास संभाल कर रखते हैं।
      मैं जब उनसे इसका कारण पूछा तो उन्होंने जवाब दिया।
      यादें हैं जी…

  2. Wo daur kuch alag hi tha hum padhkar us seen ki kalpana bhi saath saath karte jate they hansi me haste aur dukh me aansoo bhi aate jate ,

  3. हमेशा की तरह आपके लेख को पढ़कर बहुत आनंद आया।

  4. सर, बहोत ही तथ्यपूर्ण जानकारी साजा की है आपने.

  5. आपका सपना पुरा हुआ। सच ईश्वर की कृपा से क्यों कि आपने सच्चे मन से चाहा व अमिताभ बच्चन जी के संस्कारों से हमे सिखना चाहिए नम्रता व दुसरो के प्रति व काम के प्रति लग्न आदर भाव जो विलुप्त होता जा रहा है

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